STORYMIRROR

Aman Srivastav

Abstract

4  

Aman Srivastav

Abstract

दहलीज़

दहलीज़

1 min
507

पैरो के निशान जो छोड़ कर चले गए

अब दहलीज़ के आगे जाना मना है


अब तो सँवरती है जिंदगी खामोशियों में

अपनो का भी आना जाना मना है


आसमान से बारिश की बूंदो ने कोशिश जो की

अब बह कर उस पार जाना मना है


जब सफाई के तौर तरीकों से मिट जाए

ऐसे में राहो से जो गुज़रे उनका आना मना है


इस तरह रह गयी जो बातो की लकीरें

अब दहलीज़ के आगे जाना मना है


बांट दिए कई रिश्तो की मुस्कुराहट को

उस सफर में फिर से लौट जाना मना है


आज दहलीज़ें जीती है ऐसी ज़िन्दगी

तन्हाई को भी लौट कर आना मना है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract