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Hardik Mahajan Hardik

Abstract

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Hardik Mahajan Hardik

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डर

डर

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डर के साँयों में आज जी रहें हैं सभी।

अपना कल आज में देख रहें हैं सभी।


समय विपरीत परिस्थितियों में पड़ा।

निरन्तर इसके मद्धे जी रहें हैं सभी।


लीन मुक्त विलिन अंतराल में दुलर्भ।

कैसे होगा सुलभ जी रहें हैं सभी।


ख़ामोशी आज हर देश के भीतर हैं।

आज ख़ामोशी में जी रहें हैं सभी।


करता रहा निरन्तर फिर एक विचार।

कैसे इसके भीतर जी रहें हैं सभी।


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