दौड़ लगाइये
दौड़ लगाइये
अब वक़्त काटने का भी, लोग उपाय पूछते हैं,
यहाँ वक़्त भागता है, और हम उसके पाँव ढूँढते हैं।
ये बुढ़ापे का रोना इंसान को, बहुत कमज़ोर करता जाता है,
तब घर में खाली बैठ कर वो, बढ़ती उम्र का हिसाब करता जाता है।
इसलिये अपने एकाकीपन से आप, ज़रा भी ना घबराइये,
बाकी सब लोगों की तरह आप भी, खड़े होकर वक़्त के साथ दौड़ लगाइये।
शिकवा ना करें अपनो से कि वो अब, अपने में मस्त रहते हैं,
अरे हमें भी कहाँ फुरसत है, कि हम अब उनके नखरे सहते हैं।
इस ढलती उम्र के दौर में अब, खुद को खुद के अंदर छुपाईये,
जितने भी शौक अधूरे रह गये थे कभी, उन सभी पर अब गौर फरमाइये।
कभी चिकित्सक बन कर, पेड़ - पौधों का दर्द सहलाइये,
तो कभी मन ही मन कुछ याद करके, एक प्यारा सा गीत गुनगुनाइये।
कभी पंछियों की ध्वनियों को, अपने मुख से सुनाइये,
तो कभी प्रकृति के भावों को, अपनी कला से चित्रकारी में सजाइये।
गर हाथ - पाँव काम ना भी करें, तब भी प्रभु स्मरण में ध्यान लगाइये,
गर फिर भी खाली समय बचे तो, बंद पलकें कर योग को अपनाइये।
देखिये साहब जब तक इस शरीर में श्वास है, तब तक हमारे पास जीने की एक आस है,
इस आस को इसलिये व्यर्थ में ना गंवाइये, जितना भी जैसा भी हो समय के साथ दौड़ लगाइये।।
