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रिपुदमन झा "पिनाकी"

Abstract

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रिपुदमन झा "पिनाकी"

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चिपकू मेहमान

चिपकू मेहमान

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भारत की संस्कृति महान,

अतिथि को मानें भगवान।

करते आदर और सत्कार,

घर में जो आते मेहमान।।


पर होते कुछ चिपकू ऐसे,

मत पूछो अब कैसे-कैसे।

जाने का कोई नाम न लेते,

चिपके जाते गोंद के जैसे।


आकर ऐसे जम जाते हैं,

देने को बस ग़म आते हैं।

इधर उधर की बातें लेकर,

पहरों तक वो बतियाते हैं।


घर मेरे भी एक दिन आए,

एक मेहमान जी बिना बुलाए।

सोचा कुछ दिन को आएंगे

रह दिन चार चले जाएंगे।


कुछ दिन खातिरदारी कर ली,

अतिथि की सत्कारी कर ली।

फरमाइश कर सब बनवाते,

सुबह, दोपहर, शाम वो खाते।


नई - नई फरमाइश सुन कर,

हम लोगों को आता चक्कर।

मेहमानी में आया पसीना,

बीतने को था एक महीना।


मेहमां वो काम न काज के,

थे लेकिन दुश्मन अनाज के।

चिपक गया ऐसे वह घर में,

दर्द दे रहा था वह सर में।


एक दिन मैंने फिर उकता कर,

पूछ लिया बस उससे जाकर।

कबतक मुफ्त की तुम खाओगे,

ओ अतिथि तुम कब जाओगे?


देख के मेरे उखड़े तेवर,

लगा कांपने वह घबराकर।

अपना सब सामान उठाया,

गया जो फिर, न लौट के आया।



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