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AKIB JAVED

Abstract

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AKIB JAVED

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छोड़ दी

छोड़ दी

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वो सुई से भी पतली गली छोड़ दी

देख उनको भी हमने हँसी छोड़ दी


सारे अफ़साने हमने लिखी छोड़ दी

ज़िन्दगी की ये खिड़की खुली छोड़ दी


रहनुमा ज़िन्दगी का न मिल पाया ग़र

हमने भी अपनी ये ज़िन्दगी छोड़ दी


दर्द को रुख़्सत जो दिल से करने लगे

दिल से हमने भी उनकी कमी छोड़ दी


साथ रहकर मिला ज़िन्दगी में बहुत

बेवजह उसने तो दोस्ती छोड़ दी


देख उनको बहुत ज़िन्दगी में सुकूँ

यार के ख़ातिर अपनी ख़ुशी छोड़ दी


बुझ गये वो दिये,घर जो रोशन किये

इस वतन के लिये ज़िन्दगी छोड़ दी.


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