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Archana Mishra

Romance

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Archana Mishra

Romance

बंटवारा

बंटवारा

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वो कमरे नहीं जिगर बाँट रहे थे

कहते हैं हर शख्स की फिक्र बाँट रहे थे

मैं दूर से बस देखता रह गया कि

वो पलकों में सजाया मेरा घर बाँट रहे थे।


किसे वजह कहूं किसे दोष दूं

दूर से सही सबमे शामिल मैं भी हूँ

कोशिश हारी शिकवे बाजी मार रहे थे

वो पलकों में सजाया मेरा घर बाँट रहे थे।


वो दिवार और दरवाजे सिर्फ नक़्शे में थे

मेरी उम्मीद के धागे भी वहीं एक बक्से में थे

सामान ही नहीं जज़्बात भी हो शिकार रहे थे

वो पलकों में सजाया मेरा घर बाँट रहे थे।


मुझे हिस्से में नहीं किसी किस्से में जगह दे देते

मेरी उम्मीद को बख्श कर मुझे सजा दे देते,

नीयत की लड़ाई में एहसास हार रहे थे

वो पलकों में सजाया मेरा घर बाँट रहे थे।



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