Sudhir Srivastava
Children
बैठे हो मुंडेर पर क्यों?
पास नहीं आते हो क्यों?
दाँत दिखाते गुस्से में क्यों?
हमें डराते चख चख कर क्यों?
नीचे आओ बंदर जी
रोटी खाओ बंदर जी,
फिर तुमको अंगूर खिलाऊँ
तुमको अपना दोस्त बनाऊँ।
कुण्डलिया
दोहा
कुण्डलिनी छंद...
मुक्तक
रोला छंद
चौपाई छंद - च...
दोहा गीत -गठब...
चौपाई छंद - प...
तुम्हारे लिए भोजन लाऊँगी आज तुम्हें उड़ना सिखाऊँगी। तुम्हारे लिए भोजन लाऊँगी आज तुम्हें उड़ना सिखाऊँगी।
तुम जैसी हो वैसी है रहना, आशीर्वाद है मेरा तुम ज़िन्दगी भर खुश रहना। तुम जैसी हो वैसी है रहना, आशीर्वाद है मेरा तुम ज़िन्दगी भर खुश रहना।
चुन चुन करती आयी चिड़िया काम की बात बतायी चिड़िया ! चुन चुन करती आयी चिड़िया काम की बात बतायी चिड़िया !
नज़रों से मिलाओ नज़रों को, सिर झुका-झुका क्यों चलते हो! नज़रों से मिलाओ नज़रों को, सिर झुका-झुका क्यों चलते हो!
हर रोज खेल ही खेल में नयी कहानी शुरू होतीं थी! हर रोज खेल ही खेल में नयी कहानी शुरू होतीं थी!
आज कुछ कहना ना पड़ता मैं तेरा होता तू मेरी होती। आज कुछ कहना ना पड़ता मैं तेरा होता तू मेरी होती।
पापा पापा कह के फिर है हंसती, प्यारी है मेरी बिटिया रानी! पापा पापा कह के फिर है हंसती, प्यारी है मेरी बिटिया रानी!
नहीं गुणगान कर सकती कि ग़म कितने उठाये माँ। नहीं गुणगान कर सकती कि ग़म कितने उठाये माँ।
देख चिरैया प्यासी है। देख चिरैया प्यासी है।
उतना ही लेना साहिब जितना तुम खा सको क्योंकि गरीब का बच्चा भी खाने को तरस रहा उतना ही लेना साहिब जितना तुम खा सको क्योंकि गरीब का बच्चा भी खाने को तरस रहा
नीले पंखों वाली मैं हूं मुझे आप सभी से बहुत प्यार है। नीले पंखों वाली मैं हूं मुझे आप सभी से बहुत प्यार है।
पीते धूप-हवा कभी बारिश भरा है इनमें जोश-उमंग पीते धूप-हवा कभी बारिश भरा है इनमें जोश-उमंग
आज कहते हैं उन सभी शिक्षको को धन्यवाद, जिन्होंने हमें इस काबिल बनाया। आज कहते हैं उन सभी शिक्षको को धन्यवाद, जिन्होंने हमें इस काबिल बनाया।
आओ मिलकर हम सब भैया ज्यादा पेड़ लगाएंं! आओ मिलकर हम सब भैया ज्यादा पेड़ लगाएंं!
कानन सूने सूने लगते , वनचर है भयभीत सभी ! नभ बादल को तरस रहे हैं,। कानन सूने सूने लगते , वनचर है भयभीत सभी ! नभ बादल को तरस रहे हैं,।
हमारे तो घर आँगन में ही ठहाके मारते हैं राष्ट्रीय पक्षी मोर। हमारे तो घर आँगन में ही ठहाके मारते हैं राष्ट्रीय पक्षी मोर।
कितना पवित्र रिश्ता था मेरे खिलौनों का, आज इंसानी रिश्तों में लव जिहाद आते हैं। कितना पवित्र रिश्ता था मेरे खिलौनों का, आज इंसानी रिश्तों में लव जिहाद आते है...
चलो जरा अब तुम भी बता दो मुझे कि क्या तुम्हारा भी बचपन तुमसे दूर था। चलो जरा अब तुम भी बता दो मुझे कि क्या तुम्हारा भी बचपन तुमसे दूर था।
समृद्ध साहित्य सबका अभिमान जब होगा उसके उत्थान। समृद्ध साहित्य सबका अभिमान जब होगा उसके उत्थान।
बुक का कवर उलट गया लिखा था नाम प्रतीक प्रभाकर कक्षा तीसरी। बुक का कवर उलट गया लिखा था नाम प्रतीक प्रभाकर कक्षा तीसरी।