बलात्कार अखिर क्यों?
बलात्कार अखिर क्यों?
बलात्कार अखिर क्यों?
मन तरसे, मन विचलित हों
क्या यह सिर्फ इंसानों की भूल है?
क्या यह सिर्फ जीवन की खेल-कूद है?
अन्धकार के देहरी में
मासूमियत की चिल्लाहटें हैं
मन के अंधकार में
निर्ममता की कहानियाँ हैं
कलंकित कर दिया उनकी आत्मा को
खून की बूँदों से अंधकार छिड़क रहा है
महिला की सभ्यता को हैंसी-खेल बना रहा है
हैरत की आवाज दबी हैं
बलात्कार अखिर क्यों?
यह प्रश्न हमेशा मन में बसता है
न्याय की मूर्ति को हाथों से उठाता है
बच्ची की मासूमियत पर वह खिलवाड़ करता है
आओ मिलकर ये वादा करें
कि बलात्कार की रोकथाम करेंगे
न्याय के बंधनों को संवारेंगे
बलात्कार को लालच के साथ बर्बाद करेंगे
अब हो गई हैं भय से परास्त
नारी शक्ति आई हैं आपके खिलाफ
सच्चाई की दीप्ति जला रही हैं
बलात्कार के अंधकार को मिटा रही हैं।
