बिन तुम्हारेअधूरी हू मैं
बिन तुम्हारेअधूरी हू मैं
बिन तुम्हारे अधूरी हूँ मैं.....
( एक अध्यापिका का अपने छात्रों के नाम संदेश )
माना तुम थोड़े नटखट हो,
थोड़े चंचल हो, थोड़े नादान भी हो तुम
अपनी ही नासमझियों से, डाल देते हो खतरों में
अपनी ही नहीं, कई बार हमारी जान भी तुम,
गुस्सा करती हूँ तुम्हें जान कर और अपना मानकर मैं
टोकती हूँ कि कोई और, न टोके तुम्हें
रोकती हूँ कि कोई और, न रोके तुम्हें
कोई तारीफ़ कर दे जो तुम्हारी
तो, दोगुनी हो जाती हूँ घमंड से फूल के मैं
दिन की शुरुआत खुशनुमा हो जाती है
जब मेरी कक्षा की हर कली मुस्कुराती है
माना पढ़ाते-पढ़ाते बीच में तुम्हारा चुपके से
कोई शरारत कर जाना खिजाता है मुझे, पर जब
आते नहीं तुम, तो तुम्हारा ही ध्यान आता है मुझे
तुम आगे बढ़कर पीछे देखना बेशक भूल जाते हो
पर जब सिखाई सीख को तुम आचरण में ढालते हो
तो सच मानो सही मायने में गुरु दक्षिणा दे जाते हो
तुम नटखट ही सही पर हमारा स्वाभिमान हो
आज दिल से कहती हूँ बिन तुम्हारे अधूरी हूँ मैं.....
बिन तुम्हारे अधूरी हूँ मैं.....
