बहार
बहार
अब तो दिलों में नफ़रत की दरार है
आती कहा मुहब्बत की पुकार है
मौसम है ये कैसा बेदर्द सा यहाँ
ख़ुशहाल की नहीं आयी बहार है
मैं तो तड़फता हूँ हर पल ख़ुशी को ही
आता नहीं यहाँ दिल को क़रार है
ए दोस्त क्या करूंगा शहर में जाकर
की कौन करता मेरा इंतिज़ार है
है अजनबी यहाँ चेहरे हूँ तन्हा मैं
कोई नहीं यहाँ अपना तो यार है
दुश्मन मिटा दूँ मैं आज़म सभी अपने
नफ़रत भरी दिल में ही बेशुमार है।
