बेटी की माँग
बेटी की माँग
हद से ज्यादा आरोपों ने, अब तक मुझपर वार किया।
एक भूल बस यह थी मेरी,बिन सोचे ही प्यार किया।
मेरी सहनशक्ति को नर ने, मेरी कमजोरी समझा।
मेरे पावन प्रेम हृदय को, पैरों की डोरी समझा।
घूम रहा जो है रातों में,नहीं उसे कुछ कहती है।
देर मुझे हो जाये पलभर, दुनिया ताने देती है।
तुम लोगों के मन में चाहे,मेरा कैसा चरित्र हो।
लेकिन क्या खुद से पूछा है,तुम गङ्गा से पवित्र हो?
संस्कारों का ठेका खाली, नहीं ले रखा बेटी ने।
बेटे भी संस्कार सीख ले, माँग रखी है बेटी ने।
