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Haya Orhaan

Tragedy

4.8  

Haya Orhaan

Tragedy

Bejaan

Bejaan

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बेजान  

~ नन्ही परी


मैं नन्ही परी, मैं नाजुक कली  

मैं दिल की हूँ धड़कन, मैं सबकी सखी  

फिर क्यों अनजान हैं? क्या ये नादान हैं?  

क्यूँ समझते नहीं  

मैं ज़िंदा हूँ लेकिन नहीं जी रही।


है सूखे से पत्ते सी हालत मेरी  

मुसलसल बिगड़ती ये तबियत मेरी  

मेरे दर्द-ओ-ग़म से जो हैं बेखबर  

उन्हीं की बदौलत ये आज़ियत मेरी  

ज़माना हुआ है मुझे मुस्कुराए  

क्यूँ उनको ज़रा सी फ़िकर भी नहीं  

क्या वो नादान हैं क्यूँ समझते नहीं  

मैं ज़िंदा...  


मेरे सारे ख़्वाब, मेरी ख़्वाहिशें  

दफ़न हो चुकी हैं क़ब्र में कहीं  

उम्मीदें टूटी, भरम सारे टूटे  

सफ़ेद हुए हैं कई ऐसे चेहरे  

जो थे सुनहरे कभी  

कुछ भी नहीं बाकी, अब ढलने लगे हम भी सूरज के भाँति  

क्यूँ उनको फ़िज़ा का अंदाज़ा नहीं  

क्या वो नादान हैं क्यूँ समझते नहीं  

मैं ज़िंदा... |

Pen name 

Haya 


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