STORYMIRROR

Sunil Kumar

Children

4  

Sunil Kumar

Children

बचपन के दिन

बचपन के दिन

1 min
379

बचपन के दिन कितने सुंदर

रातें भी कितनी सुहानी थीं

दादा-दादी के संग जब 

परियों की कहानी थी।


न था अपना घर बड़ा 

न कोई घोड़ा-गाड़ी थी 

दादा-दादी के कंधों पर 

होती अपनी सवारी थी। 


पूरी होती थी मेरी हर चाहत 

हसरत कोई न रहती बाकी थी

लाख खता करता था फिर भी 

दादी सीने से लगाती थी।


घर-आंगन में भर जाती थी

कितनी खुशियां 

जब दादी स्नेह के मोती लुटाती थी।


त्योहारों पर मिलजुल कर हम 

कितना मौज मनाते थे 

दादा-दादी हमको 

खिलौने नए दिलाते थे।


पर अब वो दिन रात कहां

बचपन वाली वो बात कहां

महलों सा अब घर अपना 

पर अपनों का साथ कहां।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Children