बचपन का प्यार
बचपन का प्यार
बचपन में रहता वो घर के पास,
वो लड़का था मेरे लिए सब से ख़ास।
रोज़ सुबह वो दौड़ लगाता,
शाम को था वो गाना गाता।
उसकी हंसी में मैं खो जाती,
सपनों में बस उसको पाती।
एक दिन वो मेरे घर पे आया,
खेलने को संग अपने बुलाया।
खुशी से मैं तो झूमने लगी,
गुड़िया को अपने चूमने लगी।
उस दिन से हम साथ ही खेलते,
कुछ पल लड़ते कुछ पल हैं बिगड़ते।
कब तक रूठा मुझसे रहता,
फिर आके वो है बट्टी करता।
सालों से है ये चलती कहानी,
बीता बचपन, बीती जवानी।
आज बने हैं हम दादी दादा,
उम्र गुजर गई आधे से ज्यादा।
आज भी है वो मेरा पक्का यार,
मेरा पहला, सच्चा बचपन का प्यार।
