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मानव सिंह राणा 'सुओम'

Abstract

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मानव सिंह राणा 'सुओम'

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बाकी नहीं

बाकी नहीं

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ज़िंदगी में अब तो कोई शोख़ियाँ बाक़ी नहीं, मय तो है मौजूद, लेकिन साक़िया बाक़ी नहीं।
 भीड़ में हम हैं अकेले, आज भी बस इस क़दर,
पास है कोई मगर, हमराज़ भी बाक़ी नहीं।
 वक़्त बदला, पर न बदले हम ज़रा भी आज तक,
 पिस रहे गेहूँ अभी पर, चाकियाँ बाक़ी नहीं।
 दिल से रिश्तों को सँजोया हमने है बस आज तक,
 ब्याज सा प्यारा है नाती, लोरियाँ बाक़ी नहीं।
रिश्तों का वो भाव बदला, हो गई दूरी बहुत, लोग मिलते हैं मगर अब, नर्मियाँ बाक़ी नहीं।
 जिसने सींचा था इसे भी प्यार से ही आज तक,
छाँव देती पेड़ पे वो टहनियाँ बाक़ी नहीं।
ऐ 'सुओम' अब सोच मत तू इस ज़माने की ख़लिश,
अब कहाँ वो ख़त पुराने, चिट्ठियाँ बाक़ी नहीं।


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