STORYMIRROR

Lisha Sachdeva

Abstract

3  

Lisha Sachdeva

Abstract

बागे- बहार च

बागे- बहार च

1 min
422

गम तो आते जाते रहते, इस गम का यारो कया करना ।

बुरा बुरा है,भला भला है,यही तो बस अब पता है करना।

जीने ना देते जो तूफा,उनसे लड़ के आगे बढना।

मजिंल दिख जाए जब आगे सोच समझ के 

तब दम भरना ।

   काश कोइ करछी हो ऐसी

दिल का पतीला कर दे खाली।

जो मन हो बस रखें उसको

जो ना भाये बहा दे नाली।

यादो मे बस फूल न खिलते,

कुछ कचरा भी रह जाता है,

बस बागे- बहार ही मिलती

सांसो की कोइ लौ न बुझती।


काटों पे ना धयान दे पगले

फूलो की तू खूशबू सूंध

भूल जाएगा सारे गम 

जब जाएगा तू उसमें रम।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract