औरत
औरत
एक अभिमान, या अभिशाप.....
सुंदरता का पर्याय, सह रही अन्याय
प्रीत की अभिव्यक्ति, अवहेलना भुगतती,
कोई वस्तु नहीं, इसमें भी एक जीव है
जीवंत संसार में मानो ये निर्जीव है,
नन्ही बालिका से नारी तक के सफर से गुजरती
पल पल अपने अातम सम्मान से लडती,
मानव के भेस में भेडिये घूम रहे
लज्जा व सम्मान का परिहास कर रहे,
कुछ आगे का क्या सोचे.. " बेचारी "
हर क्षण.. आत्म - रक्षा के लिए लड रही,
आँगन की दहलीज लांघते, पैर काँप रहे
सकुशल घर लौट आऊँ.....
माँ के नैन राह ताक रहे,
ये भय दिन - रात सताता है
कयूं ईश्वर ने दी ये काया ---
मन सोचकर घबराता है,
पराये कया -यहाँ अपनों ने उतारी है लज्जा
एेसे आदम को ना दंड है... ना कोई सजा,
हर कदम पर भेडियों ने बिछाया जाल है
देश और समाज यहाँ - बस शर्म से लाल है,
दंड संहिता है, पर कठोर पालना नहीं
संवेदनशीलता का यहां कोई स्थान नहीं,
बस बहुत हुआ कथानक ----
अब " काली " का रूप धरना है
इन " रक्त बीजों " का यहीं वध करना है।
