अर्धांगिनी
अर्धांगिनी
अर्धांगिनी वो होती है जो कि पग पग साथ निभाती है
सुख हो या फिर दुःख हो कोई हिम्मत बढ़ाती है
प्रीत की रीत निभाने को छोड़ देती पीहर अपना
ससुराल को वो निजी नेह-निष्ठा से संवारती है
सभी की सेवा और सत्कार पूरी लग्न से करती
धीरे-धीरे प्रेम के दीपक दिलों मे वो जलाती है
श्रृंगार करती है स्वयं का वो जब जब भी
खनक-महक से मकान को मंदिर सा बनाती है
चलती चहकती करती हैं हँसी और ठिठोली
मृदु बोली अरु मुस्कां से सब रिश्ते वो सजाती है
सौंप देती है तन मन और पूरा ही स्वजीवन वो
इक सामान्य से इंसान को देवता वो बनाती है।
