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Anwar Suhail

Abstract Tragedy

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Anwar Suhail

Abstract Tragedy

अनवर सुहैल की कविता। ..बुढ़ापा

अनवर सुहैल की कविता। ..बुढ़ापा

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बाहर भरा-पूरा शहर 

भीतर एक अकेला वृद्ध

थरथराते हाथों टटोलता

सहारा थामने के प्रयास में 

छूट-छूट जाता सारा जतन

फूलता दम, उखड़ती सांसें 

लड़खड़ाता ढांचा झोल खाता 

सम्भल भी जाता जैसे चमत्कार

चौकी का पाया पकड़ राहत की सांस


बाहर भरा-पूरा शहर 

भीतर एक अकेला वृद्ध

हर दिन घटती उमर

हर दिन कमज़ोर होता एक अंग 

हर दिन घटती उम्मीदें

हर दिन दूर होते क़रीबी 


और यह भी सच है 

हर दिन फिर लौट आती सांसें 

हर दिन फिर यूं ही गुज़र जाता।।।





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