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अंजनी कुमार शर्मा 'अंकित'

Inspirational

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अंजनी कुमार शर्मा 'अंकित'

Inspirational

अकूत संपत्ति

अकूत संपत्ति

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गमले में एक पेड़ लगाया, 

उसमें भर दिए पैसे।

देखभाल मैं उसकी करता, 

मात-पिता के जैसे।


जैसे-जैसे बढ़ता जाता, 

वैसे खुशी थी बढ़ती।

पैसों के फल लगेंगे, 

यह आशा थी जगती।


गाड़ी, बंगला, नौकर-चाकर, 

जीवन सुखमय हो जाएगा।

छट जाएंगे दुःख के बादल,

सुख ही सुख छा जाएगा।


कुछ वर्षों में वह बड़ा हो गया,

मन गदगद हो आया।

पुष्प चमक रहे रजत वर्ण सम,

थी कनक पत्रों की छाया।


एक सुबह जब उठकर देखा,

रंग-बिरंगे नोट चमक रहे थे।

डाली-डाली झुकी हुई थी,

और उसमें नोट लटक रहे थे।


आँख मीचकर पास गया तो,

देखा फल थे प्यारे-प्यारे।

हुआ बड़ा आश्चर्य कि आखिर,

नोट कहाँ गये सारे।


लेकिन तब जेहन में कौंधा,

होता क्यूँ इतना व्यथित है।

छाया, फल, हवा, डाली, पर्ण,

यही अकूत संपत्ति है।



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