अकेला चलो रे
अकेला चलो रे
मैं अकेला ही चला था सफर में,
कोई साथ मेरे हो ना सका था !
थी मुसीबत लाख राहों में हमारे,
फिरभी मुझको हरा ना सका था !
सहारे की जरूरत मुझे ना लगी,
हवा के रुख को मैं जानता था !
आँधियों के थपेड़ों से डरता नहीं,
मुझे तो बखूबी जूझना आता था !
मुझे जो मिलते थे इन राहों में,
उन्हें मंजिल तक पहुँचा देता था !
ना कोई शिकायत का ही इजहार,
कभी ना स्वप्न में भी करता था !
मुसाफिर हैं हमसभी इस डगर के,
साथ जबतक साथ है चलते रहेंगे !
कारवाँ के लोग अपनी मंजिलों पर,
पहुँचकर फिर अकेले चलते चलेंगे।
