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Dr Jogender Singh(jogi)

Abstract

4.0  

Dr Jogender Singh(jogi)

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अकड़ूँ धुँआ

अकड़ूँ धुँआ

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राख के ढेर में हाथ घूमा कर देखा इस उम्मीद से बार बार ,

शायद किसी अकड़ी हड्डी का बड़ा सा टुकड़ा मिल जाये ? 

मायूसी झलक पड़ी , उदासी बड़ गयी , पर उम्मीद थी बरकरार ।

ऐसा हो नहीं सकता , सब भस्म हो जाये ।

एक चिंगारी से सारी अकड़ चली जाये ।

छान छान कर देखी गयी राख जब ।

महीन से कुछ टुकड़े मिले तब ।

तो सारी अकड़ की वजह यह छँटके थे ?

हाथ से छटंको को धीरे से सहलाया ।

पर अकड़ का कोई निशान नज़र नहीं आया ।

मैं सोच में पड़ा था , यूँ ही खड़ा था ।

पहेली अकड़ की अबूझ , सुलझाने चला था ।

तो क्या धुँए के साथ चिता के ,

अकड़ उड़ जाती हवा में ? 

बाक़ी बची राख तो ,नरम है बिन अकड़ के ।

तो हवा में या हवा पर सवार धुएँ में है कुछ ऐसा ।

बनाता जो नर्म राख को ,अकड़ूँ सूखी लकड़ी जैसा ।

बिखर गया रुआब , उड़ गया गुमान बन कर सफ़ेद धुआँ ।

बैठा हूँ अनसुलझी अकड़ की पहेली लिये ।

सुलगती , अधजली और ठण्डी पड़ गई चिताओं के बीच । 


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