"ऐ जिदंगी"
"ऐ जिदंगी"
मंजिल मुझे मेरी छोड चली,
रास्तों ने संभाल लिया है,
जा जिंदगी तेरी अब जरूरत नहीं,
मुझे हादसों ने पाल लिया है।
झूझती रही, टूटती रही, बिखरती रही,
कुछ इस तरह से ज़िन्दगी निखरती रही।
जीवन एक ऐसी यात्रा ही रही,
रो-रो कर जीने से बहुत लम्बी लगी,
और हंस-हंस कर जीने से
कब पूरी हो चली,
पता भी नहीं चली,
रो-रो कर कब तक इसे काटेंगें यारो,
मुस्कराकर दुख छिपाना भी एक हुनर है।
हौसलों से सींचना है, तुझे ऐ जिदंगी,
यारो बुलंद होंसलों भरी ज़िंदगी में,
मेरा अपना भी एक मुकाम होगा,
लिखूंगा इक क़िताब अपनी ऐ जिदंगी,
पर हर कागज़ पर तेरा ही नाम होगा।
