STORYMIRROR

Rajiv Jiya Kumar

Abstract

4  

Rajiv Jiya Kumar

Abstract

अभिलाषा

अभिलाषा

1 min
263

हर आशा

हर जिज्ञासा

बिन कोई तमाशा

अतृप्त हर प्यासा

पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।

बघारने से ज्ञान 

रोटी कहाँ मिलती

धोती कहाँ मिलती

मिलती है बस निराशा

पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।

सौंपा जिसे ख्वाब 

रौंदकर सब आगे बढा

डाले काला नकाब

जैसे प्राचीन ईक नवाब 

कुचलता सब दिलासा 

पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।

बदल गए सब मायनें

बदले हैं सब अफसाने

जुुुमले ने तोङ दिए

मग्न मस्ती और मुस्काना 

पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।

आओ झूूूले

झूले मचल मचल

झूूूूले चाह के

झूूूूले हुसाल के

झूूूूूले उल्लास के

सब बन जाना है 

ईक अफसाना 

दूूर है बहुत अभी भरोसा

पूूूरी ऐसे कब अभिलाषा।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract