अभिलाषा
अभिलाषा
हर आशा
हर जिज्ञासा
बिन कोई तमाशा
अतृप्त हर प्यासा
पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।
बघारने से ज्ञान
रोटी कहाँ मिलती
धोती कहाँ मिलती
मिलती है बस निराशा
पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।
सौंपा जिसे ख्वाब
रौंदकर सब आगे बढा
डाले काला नकाब
जैसे प्राचीन ईक नवाब
कुचलता सब दिलासा
पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।
बदल गए सब मायनें
बदले हैं सब अफसाने
जुुुमले ने तोङ दिए
मग्न मस्ती और मुस्काना
पूरी ऐसे कब अभिलाषा।।
आओ झूूूले
झूले मचल मचल
झूूूूले चाह के
झूूूूले हुसाल के
झूूूूूले उल्लास के
सब बन जाना है
ईक अफसाना
दूूर है बहुत अभी भरोसा
पूूूरी ऐसे कब अभिलाषा।।
