आज़ ख़ुद को पहचानता हूं
आज़ ख़ुद को पहचानता हूं
किन नजरों का मैं ताज़ हूं,
किस नज़र में मैं आज़ हूं !
कल का मैं जानता नहीं हूं,
आज़ ख़ुद को पहचानता हूं !
कौन मुझे याद कर लेता हैं,
कौन मुझे अपना बना लेता हैं !
मैं अपनों की ख़ोज नहीं करता हूं,
इसी कोशिश में सबको अपना बना लेता हूं !
मैं आज़ ख़ुद की ग़वाही लिए खड़ा हूं,
ख़ुद से ले मशवरा आगे बढ़ा हूं !
कल को मैं जानता नहीं हूं,
आज़ ख़ुद को पहचानता हूं !
