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मुक्ति
मुक्ति
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© Manoranjan Tiwari

Inspirational

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बड़ा भाई होने के नाते मैं ही उसे लेकर गया था सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर में। 800 रूपया और मैट्रिक का सर्टिफिकेट जमा कर, वर्दी मिल गई और डिफेंस कॉलोनी के एक अमीर आदमी के घर के बाहर खड़ा रह कर पहरा देने की ड्यूटी। उम्र कच्ची थी उसकी, चेहरा पर चमक, गर्व और मासुमियत से खिला हुआ। पर उसे नहीं पता था कि अब इस चेहरे का हर रंग उड़ना है यहाँ। उसे नहीं पता था कि गर्व और मासुमियत से खिला उसका चेहरा मुरझाने वाला है यहाँ। सुपरवाइजर ने उसे कुछ बातें सिखाई जैसे जब साहब या मैडम आए तो पैरों को पटक कर मुस्तैदी से सेल्यूट करना है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सेल्यूट करना इतना जरुरी क्यों है? नमस्ते कर सकते है, प्रणाम कर सकते है, जो वह बचपन से अपने से बड़ों को सहजता से करते आ रहा है, मगर यह सेल्यूट करना उसे बड़ा टेड़ा काम लग रहा था, आदत नहीं थी, गलती से नमस्ते ही कर लिया करता कभी। साहब हर बार उसे अज़ीब नज़रों से देखता था। डरना, सहम जाना उसके स्वभाव में था नहीं मगर उसे एहसास हो रहा था कि यह भी उसके ड्यूटी का एक हिस्सा है। दो-तीन दिनों में ही मुरझाने लगा था था, नए उम्र का लड़का, ना खैनी ठोकने की आदत ना मन बहलाने को और कुछ, एक ही जगह बारह घण्टे उठ-बैठ के बिता देना आसान नहीं था उसके लिए। ये घण्टे बड़ी तेज़ी से उसके अंदर के कोमलता/मासुमियत  को सोखे जा रहा था। उसे नहीं पता था कि जिस  घर की रखवाली वह कर रहा है, उस घर पर अगर कबूतर भी आकर बैठ जाए तो उसे उड़ाने की जिम्मेवारी उसकी है। चार दिनों के बाद उस घर से एक लड़की निकली और अपने शानदार तमीज़ में कहा "तुझे दिख नहीं रहा? गाडी धूप में जल रही है, अंदर से कवर लेकर ढक दे इसे" इस वाक्य को सुन कर कुछ देर वह अवाक सा रह गया, पैर जैसे जाम हो गए उसके क्योंकि इसी उम्र के, इतनी ही खुबसूरत लड़की के नज़रों में "रब की तरह" होने के सुख को वह अपने मन में अब भी एहसास से भरे रखा था। इस लड़की के ऐसे वाक्य ने उसे झकझोर दिया, और शायद पहली बार ही उसे अपने जीवन के निरर्थकता का एहसास हुआ। आठवें दिन अंदर से किसी ने पानी का मोटर चला दिया था, टंकी भर चुकी थी और पानी फर्श पर बाह रहा था, उसका ध्यान इस बात के तरफ ना होकर शायद उस लड़की के ख्यालों में चला गया था जिसके नज़रों में "रब की तरह" था वह, तभी साहब ने आकर उसे एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दी। वह हकबका गया, निश्चय ही यह चोट उसके मन को लगी थी, जिससे वह कुछ देर के लिए बिखर सा गया। और अनेक गाली-बात सुनने के बाद वह सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर में था, रात भर का जगा हुआ लड़का, बिना खाए-पिए सायं को तीन बजे तक वहीँ दफ़्तर में पड़ा रहा क्योंकि नौकरी से तो उसे निकाल ही दिया गया था, मगर उसके मैट्रिक के सर्टिफिकेट नहीं दिया जा रहा था, सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर को नुकसान हुआ था, उसके भरपाई के लिए वे लोग उससे 1000 रूपया माँग रहे थे। उस समय फोन नहीं था किसी के पास, और उसे लग रहा था, जैसे मैट्रिक का सर्टिफिकेट उसकी जिंदगी है, जिसे छोड़ कर वह जा नहीं सकता। कहने की जरुरत नहीं कि सुबह से सायं तक वह भूखा-प्यासा लड़का कितना गिड़गिड़ाया होगा, कितना रोया होगा, क्या-क्या सुना होगा और कितना कुछ खोया होगा। बहुत देर होने पर मुझे चिंता हुई और मैं पता करने सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर में गया। वहां जाकर सब वस्तुस्थिति को जानकर आखिर 400 रुपए में बात पक्की कर उसे मैट्रिक के सर्टिफिकेट के साथ घर लेकर आया। आठ दिनों में बारह सौ का नुकशान कलेजे को छिले जा रहा था। मगर वह खुश था, आठ दिनों के बाद वह भरपूर साँस ले रहा था (जो शायद आठ दिनों से रूक-रूक कर उसके फेफड़ों में जा रही थी), हँस-बोल रहा था, पहले की तरह। आठ दिनों के बाद ही सही वह मुक्त हो गया उस जीवन से जो शायद उसे बिल्कुल ही खोखला बनाए जा रही थी।

हृदयहीन समाज की एक और तस्वीर

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