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अनीता
अनीता
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© Dr Aditi Goyal

Inspirational

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"अनीता बेटा अभी तक तुमने कपडे़ सूखने क्यों नहीं डाले, कितनी देर हो गई सारा काम पड़ा है ये लड़की देखो अभी तक सहेलियों के साथ ही बातें कर रही है।" "क्या बात है माँ क्यों घर सिर पर उठा रखा मैंने कपडे़ भी सुखा दिए और जब कपड़े सुखाने गई थी तो सारे रजाई गद्दे एक बार पलट भी आई थी फिर सूखे हुए कपड़े आपकी व पिताजी की अलमारी में रख भी चुकी हूँ। वह तो कुछ सहेलियाँ आ गई थीं उनके साथ अपने पेपर की तैयारी कर रही थी, और हाँ मैं आपको बताना भूल गई थी की मैंने दोपहर का खाना भी बनाकर रख दिया है, और जो काम रह गया है वह मैं पांच मिनट में कर दूँगी।"

गजब की फुर्ती है इस लड़की में काम कब कर जाती है, पता ही नहीं चलता जिसे देखो हर तरफ केवल एक ही नाम अनीता, रूप ऐसा जैसे ईश्वर ने बड़ी फुर्सत से बैठकर, नैन-नक्श तराशे हों और कोई देवी की साक्षात् मूर्ति बना दी हो। वाणी में इतनी मिठास, की बोलती है तो लगता है जैसे फूल गिर रहे हो।

माँ भी बेचारी क्या करें जब से अनीता ने घर का काम संभाला है वह तो काम करना ही भूल गई हैं। उन्हें तो हर समय यही लगता है की मैंने रसोई से किसी भी प्रकार की कोई आवाज आती सुनी ही नहीं, हो सकता है अनीता से कोई काम छूट गया होगा। पर मजाल तो जो अनीता कोई काम छोड़ दे।

शाम को विशंभर नाथ जी ने घर में घुसते ही सबसे पहले अनीता को आवाज लगाई, वह पानी ले आई पानी लेते हुए विशंभर नाथ जी के हाथ यह सोच कर काँप गए की बेटी के जाने के बाद सब कैसे होगा, शादी ब्याह के मामले में इतनी जल्दी हाँ कैसे कर दें। वैसे तो लड़का व उसका परिवार देखाभाला है पर लड़की की रजामंदी भी तो जरूरी है। उन्होंने जैसे ही अनीता की माँ को आवाज लगाई उससे पहले ही अनीता माँ के हाथ में चाय की ट्रे पकड़ा कर अपने कोचिंग सेंटर चली गई थी। उसने जैसे पिता के मन की बात जांच ली थी कि वे माँ से अकेले में कुछ बात करना चाह रहे हैं।

"क्या बात है जी ?",क्या आप कुछ बताना चाह रहे हो, "हाँ, क्या बताऊँ, अनीता के लिए एक जगह बात चलाई थी वैसे तो उन्हें अनीता बहुत पसंद है माँग भी कुछ नहीं है। वे तो अगले सप्ताह ही शादी के लिए तैयार हैं "। अनीता का फोटो देखते ही बोले "हमारे तो मन की मुराद पूरी हो गई। इस लड़की को तो हम पिछले 6 महीने से ढूँढ रहे थे। इस बच्ची के तो हम पर बहुत अहसान हैं। इसने पिताजी को ऐसे समय पर अस्पताल पहुँचाया जब कोई भी मदद को आगे नहीं आया।"

"जब इतना अच्छा रिश्ता है, देखे भाले लोग हैं तो क्यों इतनी चिंता करते हो, हाँ करने में इतनी देर क्यों लगा रहे हो जी।" "वह सब तो ठीक है लेकिन वे लोग नौकरी नहीं कराना चाहते।" "आप भी अपने से कुछ भी सोचते रहते हो आप उन लोगों से एक बार इस विषय में बात करके तो देखते।"

दो दिन बाद ही विशंभर नाथ जी फिर से लड़के वालो के यहाँ बात करने गए व उन्हें छः महीने रुकने के लिए राजी करके आ गये।

समय पर किसका जोर चलता है, विशंभर नाथ जी को क्या पता था कि यह अनहोनी आज उन्हीं के साथ घटने जा रही है। वे जैसे ही लड़के वालों के यहाँ से बात करके निकले मार्ग में उनका कोई पुराना दुश्मन घात लगाकर बैठा था। और....

उनको तेजी से आते हुए एक ट्रक ने ऐसी टक्कर मारी कि वो बेचारे फिर कभी उठ ही नहीं पाए, कुछ लोग दया दिखाते हुए अस्पताल ले भी गए पर उन्हें बचाया न जा सका। जैसे ही यह खबर घर तक पहुँची घर पर कोहराम मच गया। "सरोज "तो मानो पगला ही गई थीं, कहने लगी "तुम सबने इतनी भीड़ क्यों जमा कर रखी है, अनीता जरा सबको हटाओ तुम्हारे पिताजी को इतनी चोट लगी है, बेटा उन्हें आराम की जरूरत है और यहाँ सब लोग शोर मचा रहे हैं, बेटा ऐसा करो अभी सबको जाने को कह दो, कहना अभी तो पिताजी सो रहे हैं शाम को उठेंगे तब आप लोग मिलने के लिए आ सकते है।" अनीता का भी रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था। कठिन परिस्थिति में भी अनीता खुद को संभालते हुए माँ को चुप कराने का प्रयास कर ही रही थी की विशंभर नाथ जी का बेटा कॉलेज से आ गया वह घर का माहौल देखकर सक-पकाता हुआ सा भीतर घुसा, उसे देखते ही साथ अनीता खुद की रुलाई रोक ना पाई, विशंभर नाथ जी की असमय मृत्यु ने दोनों भाई- बहन को अचानक बेसहारा कर दिया था। ऐसे समय में अनीता के ताऊ जी ने सबको संभालते हुए अंतिम संस्कार का इंतजाम करवाया, व अनीता से कहा, "बेटा हिम्मत से काम लो, विशंभर अक्सर मुझसे तुम्हारी बहुत तारीफ करता था, कहता था कि तुम उसके लिए तुम बेटे से बढ़ कर हो।"

उधर जैसे ही लड़के वालों को पता चला की विशंभरनाथ जी की मृत्यु साधारण मृत्यु नहीं थी वरन् उनकी हत्या हुई थी उन्होंने तुरन्त ही रिश्ता तोड़ दिया। उनका मानना था कि अनीता वकील की लड़की है ,खुद भी वकालत कर रही है कल को क्या पता इनका संकट हमारे परिवार पर भी मंडराने लगे।"

अनीता को तो रिश्ते की कोई खबर ही नहीं थी। समय तो अपनी ही गति से चलता रहता है। परिवार के किसी सदस्य के असमय चले जाने से जो दुखों का पहाड़ अनिता के परिवार पर टूटा था उसे समय के मर्हम ने काफी हद तक भर दिया था। विशंम्भर नाथ जी की मृत्यु को अब दो साल से अधिक होने को आया था। अनीता ने अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी करके कचहरी में अपने पिता के चैम्बर में ही बैठ कर काम करना प्रारम्भ कर दिया था। घर की आर्थिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलनी प्रारंभ हो गई थी। निखिल का चयन सिविल सेवा परीक्षा के लिए हो गया था।

अनीता ने अब भी पढ़ाई जारी रखी हुई थी उसकी इच्छा अपने पिता का सपना पूरा करने की थी। उनकी इच्छा थी कि उनकी बेटी देश की सर्वोच्च कुर्सी यानी जज की कुर्सी पर बैठे। अनीता भी अपने पिता की आखरी इच्छा का सम्मान करते हुए पूरी लगन के साथ भारतीय सर्वोच्च न्यायिक परीक्षा की तैयारी में जुटी हुई थी वह अपनी मेहनत व लग्न के दम पर पहले ही प्रयास में डिस्ट्रिक्ट जज के पद के लिए चुन ली गई मौखिक परीक्षा आदि के बाद लगभग छः महीने बाद उसे अपना कार्यभार संभालना था। उसे अपनी पहली पोस्टिंग नैनीताल में मिली, इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी सम्माननीय कुर्सी पाने के कारण शहर के हर बच्चे की जुबान पर केवल एक ही नाम था अनीता शुक्ला। जिन लोगों ने उस समय अनीता का रिश्ता यह कह कर ठुकरा दिया था कि कहीं उनके परिवार का संकट हमारे ऊपर ना आ जाए वे अब हाथ मलते नजर आ रहे थे। जो रिश्तेदार उस समय मदद करने से मुँह चुरा रहे थे वे अब परम हितैषी बन चुके थे। रिश्तों की तो अब अनीता के लिए लाइन लगी हुई थी, किंतु अनीता ने अभी शादी से साफ मना कर दिया उसका उद्देश्य तो सर्वप्रथम अपने पिता के कातिलों को ढूँढ कर सजा दिलवाना था।

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