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गधे के पर
गधे के पर
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© Supreet Saini

Drama Fantasy

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गधा अपने लंच ऑवर मे विश्राम कर रहा था। आज, भाग्य से, काम कुछ हल्का था। सुबह से दोपहर तक पहाड़ के सिर्फ चार चक्कर लगाने पड़े थे। बुरे दिनों में तो, इतने ही समय में, कभी कभी उसे सात-आठ चक्कर लगाने पड़ जाते हैं। फिर पहाड़ पर चढ़ना कोई आसान काम तो है नहीं, वह भी ५०-६० किलो का भार अपनी पीठ पर लाद के। पर उसके जीवन में यही लिखा था। बोझ पहाड़ पर चढ़ाने से भी मुश्किल काम उसे उतारना होता था। जब भी ऐसा करना होता तो उतारते समय उसके सामने के दोनों पावों के घुटने कांपने लगते, और ऐसा लगता की किसी भी क्षण पैर लड़खड़ा जाएंगे। ज़रा सा पैर फिसला नहीं की हज़ारों फुट की गहराई उसे अपने भीतर समेट लेगी, यह दर गधे को उतारते समय हमेशा रहता। पर, एक बार फिर, आज वैसा दिन नहीं था - बोझ सिर्फ चढ़ाना था। शायद स्कूलों की छुटियाँ भी ख़त्म हो गयीं हैं - जिसका लाख-लाख शुक्र है - वार्ना सारा दिन ठेकेदार के बच्चे डंडा मार-मार के उसकी पीठ सजा देते। यह साले इंसान के बच्चे होते ही ऐसे हैं, क्रूरता के घने पैकेट जैसे। गधे ने कभी अपने जीवन मे गाय, कुत्ते, या बकरी, या किसी भी जानवर के बच्चे को ऐसा सलूक करते नहीं देखा था। ऐसी अमानवता सिर्फ मनुष्य के बच्चे ही दिखा सकते हैं। पता नहीं जिस दिन दिल बंट रहा था उस दिन इंसान कहाँ चला गया था? ज़रूर किसी गधे को पीट रहा होगा, गधे ने सोचा।

 

आज भी निर्दयी ने चढ़ाई के ठीक बीच में अपने खाने का पिटारा खोल लिया था। चढ़ाई की शुरुआत और अंत, दोनों में नरम मुलायन घास है, पर इन साहब को यहीं बंजर में रुकना था। अब नीचे उतर कर अगर इसके लंच ऑवर के बाहर खाना खाऊंगा, तो ये ज़रूर अपने साथ पड़ी छड़ी से मुझे पीटेगा, गधे ने निराश हो आसमान की तरफ देखते हुए सोचा।

 

गधे का छोटा भाई भी वहीँ काम करता था, पर वह छोटा होने के नाते थोड़ा नटखट और आज़ाद प्रवृति का था। गुलामी की ज़ंजीरें उसके लिए नहीं बानी थीं। एक दिन भाग जाने का निर्णय लिया। मुझे भी साथ बुलाया पर में हिम्मत नहीं जुटा पाया। पर भागने पर थोड़ी ही दूरी पर पकड़ा गया, और फिर जो पिटाई हुई उसकी  कि बस पूछिये मत। पर कुछ पंछी कैद होने के लिए नहीं बनते। सिर्फ हड्डियां टूटी थीं, इरादे नहीं। हौसला बुलंद होते ज़्यादा देर ना लगी, और मौका पाते ही फिर भाग खड़ा हुआ। पर बेचारा मोटर से टकरा कर टांग तुड़वा बैठा। इस बार मालिक ने माफ़ी के योग्य नहीं समझा उसे। ना जाने उसका मृत शरीर टैम्पो में रख कर कहाँ भेजा।

 

इससे गधे को अचानक अपने दोस्त, कौवे की बात याद आई। वह अकसर गधे से पुछा करता था कि गधों ने अब तक पंख क्यों नहीं बनवाए हैं? कौवों की कहानी सुनाता तो पता चला कि उनकी हालत भी आज के गधों जैसी ही होती थी, शायद उससे भी बद्तर। पर एक दिन सब्र का बाँध टूट गया और कौवों ने निर्णय लिया की अब वे इंसानी जुर्म और नहीं सह पाएंगे। एक सभा बुला कर विचार किया - बातों-बातों में पता चला की पहाड़ों के उस पार एक चमत्कारी तालाब है जहाँ का पानी पी कर मन मे आई हर ख्वाहिश पूरी होती है। कौवों ने निर्णय लिया की सब वहां जाएंगे और अपना शरीर छोटा और उड़ने के लिए पंख मांग कर आएंगे। बस तभी से वह कौवों जैसे दिखने लगे। और तभी से उन्होंने इंसानी ज़ंजीरों से हमेशा के लिए छुटकारा पा लिया। पूर्व की दिशा मे दो पहाड़ दूर वह तालाब था, कौवे ने उसे कई बार बताया था। अगर मालिक आज भोजन नीचे उतरने पर कर रहा होता, तो वह खुद कौवे से वहां पहुँचने के रास्ते के बारे में पूछता। खाने के समय पर कौवा इंसानी रसोईघरों के इर्द-गिर रहना पसंद करता।

 

दिन भर तो कौवे से मुलाक़ात नहीं हो पायी, पर शाम में घर लौटते समय गधे ने निर्णय किया कि रात होते ही वह तालाब की खोज में निकल जाएगा। नज़दीक के पहाड़ के तो वह रोज़ ही चक्कर लगाता था, और वहां रास्ता ढूंढने के लिए उसे रौशनी की ज़रुरत नहीं पड़ेगी। रही बात दुसरे पहाड़ की, तो उसके बारे में वहीँ पहुँच कर सोचेंगे। गधे की आँखों में सपनों की महक थी। सोचता, ज़्यादा से ज़्यादा अपने भाई की तरह मारा ही तो जाएगा, पर क्या उसका वर्तमान का जीवन मौत से बेहतर है? यह सोच उसने भरपेट खाना खाया, और घर के अंदर की रौशनी बंद होने का इंतज़ार करने लगा। आज़ादी के नशे ने नींद उसकी आँखों के आस-पास भी फटकने न दी।

 

दांतों और पाँव से कुछ मिनट तक कश्मकश करने के बाद वह रस्सी और इंसान के चंगुल से आज़ाद हो गया। सूरज, और उसके साथ की रौशनी, आने में अभी बहुत समय था। मन में विश्वास था की अगर सूरज निकलने पर मालिक ने उसे खोजने का प्रयत्न किया भी, तो तब तक वह अपने पंखों पर सवार वहां से बहुत-बहुत दूर निकल चूका होगा। यही सोचता हुआ, अपने भाग्य से भेंट करने, वह रात के अँधेरे में रौशनी खोजने निकल पड़ा। जैसा की सोचा था, पहले पहाड़ से वह भली-भाँती परिचित था और थोड़ी ही देर में शिखर तक पहुँच गया। वहां खड़े हो ऊपर देखा तो पाया की आकाश के जगमगाते तारे उसके लिए टिमटिमा रहे थे। तारों जैसी चमक अपनी आँखों में ले वह दुसरे पहाड़ तक पहुँचने के लिए वादी में उतारना शुरू किया।

 

दुसरे पहाड़ की चढ़ाई पहले से काफी कठिन थी। पेड़-पौधों का बोलबाला भी पहले पहाड़ के मुकाबले बहुत मज़बूत था - इसलिए आगे बढ़ने की रफ़्तार कुछ काम हुई। उसे लगा जैसे ये पहाड़ इंसानों की नज़रों से जैसे किसी तरह बच गया हो। पर अच्छा ही था, क्योंकि यदि पहाड़ के ज़रिये इंसान तालाब तक पहुँच गया होता तो न जाने वहां वरदान मांग-मांग कर पृथ्वी और ब्रह्माण्ड का क्या हश्र कर दिया होता। पर आज इस सब का नतीजा था की गधे के चढ़ने की रफ़्तार कम, और पेट में चूहे कूदने की रफ़्तार तेज़ हो गयी थी।

 

पहाड़ के शिखर तक पहुँचते-पहुँचते पौ फटने को थी। पूर्व से उठती किरणें आकाश को रंग कर सूरज का उपस्थित आगमन की सूचना दे रही थीं। मालिक ने अब तक उसकी तलाश शुरू कर दी होगी, सोच गधे ने पाँव तेज़ किये। शिखर का नज़ारा देखते ही बनता था - चारों ओर घनी हरियाली से ढके पहाड़ और उन सब के ठीक बीच में तालाब का नीला पानी। गधे ने उसी समय मन ही मन तालाब को अमृत झील का नाम दिया। सुबह का सूरज पहाड़ों को रौशनी में नहलाता हरे रंगों के अलग मिश्रणों का उत्पादन कर रहा था। दृश्य देख गधे की ख़ुशी नहीं संभल रही थी,  और वह तेज़ी से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ा। झील के किनारे खड़े हो उसने अपनी गुलामी वाली ज़िन्दगी को अलविदा कहा और पंखों की कामना करते हुए होठों से पानी का स्पर्श किया।

 

देखते ही देखते उसके शरीर पर, पीठ के नज़दीक, दो पंख अंकुरित हुए, और आकार लेना आरम्भ किये। कुछ ही मिनटों में उसके पास दो विशाल, मज़बूत पंख थे। वह उन्हें मोड़ सकता था, फड़फड़ा सकता थे, और यहाँ तक की उनसे कान में खुजली भी कर सकता था। अंततः उसे विश्वास हुआ की सचमुच उसके पंख आ गए हैं। इस्तेमाल करना तो आता नहीं था, पर हूँ ही फड़फड़ाना चालू किया तो १५-२० फुट की दूरी उड़ कर तय करने लगा। ख़ुशी में झूमता हुआ कभी अपने कौवे दोस्त, कभी अमृत झील, और कभी इश्वर का धन्यवाद करता। कुछ देर में उसका अपने पंखों पर नियंत्रण और विश्वास दोनों बढे, और अमृत झील के ऊपर एक लम्बी उड़ान भरने चल पड़ा। उड़ान के बीच जब उसने आस पास उड़ने वाले पंछियों की आँखों में हैरानी देखता तो खिलखिला कर हंस देता।

 

कुछ मिनटों में उसने पंखों में कुछ थकान का अनुभव किया। सोचा, पहले ही दिन इतना लालच ठीक नहीं, पंखों को एहतियात से बरतना पड़ेगा। यह सोच उसने आकाश से उतारना शुरू किया। उड़ान के बीच पीठ पर दायों ओर बहुत ज़ोर का दर्द उठा। घबराकर उसने मुड़ कर पीठ को देखा तो पाया की मालिक एक मोटे डंडे के साथ खड़ा उस पर चिल्ला रहा है, "साले गधे! उठता क्यों नहीं? तेरा बाप सारा काम करेगा क्या?"

सपना गधा अभिलाषा

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