जनाज़ा

जनाज़ा

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"तुम जाओ, बाबा। कितनी मर्तबा कहा, जब तक ऊपर से ऑर्डर नहीं आ जाता, तुम उसे दफ़ना नहीं सकते।" मुर्दाघर के गार्ड ने उसे लगभग झिड़कते हुए कहा। पिछले कुछ दिनों में गार्ड कई बार उसे देख चुका था। धंसी हुई आँखों और सूखे ठूंठ-से अधमरे बदन का वह आदमी शायद पैदाइशी बूढ़ा था। कपड़ों के नाम पर नाड़े से बाँधी हुई एक ढीली पतलून थी, जो बस पैबन्दकारी की बदौलत इज़्ज़त ढकने का काम दे रही थी। जाने कितने सावन देख चुकी थी उसकी धंसी हुई आँखें!

लेकिन इस बार सावन कुछ ज़्यादा ही मेहरबान था। उस रात पूरा-का-पूरा पुल नीचे आ गिरा था और उधर एक दुनिया उजड़ गयी थी। वो दुनिया जो पुल के नीचे बसती थी, बेज़ुबान जानवरों और बेघर इंसानों की दुनिया। नामोनिशान मिटने में कुछ घंटे भर लगे थे। जहाँ कुछ दिन पहले ग़म के बीच खुशी ढूंढती एक अजीबोग़रीब बस्ती थी, वहां आज पानी में तैरते मिलावटी सीमेंट के टापू थे। कहना मुश्क़िल था कि कौन ज़्यादा क़िस्मतवाले थे - वो, जिनकी रात कभी ख़त्म ही नहीं हुई थी या फिर वो,जिनका दिन शुरू तो हुआ, लेकिन जिन्हें रोशनी नसीब न हुई; अपनों को खोने के ग्रहण ने उनके सूरज को हमेशा के लिए डस लिया था।

उस बूढ़े ने भी किसी को खोया था। लेकिन वो औरों की तरह चीख-पुकार नहीं मचाता। न ही दहाड़ें मार के रोता। बस हर रोज़ हाज़िरी देता और एक तुड़ी-मुड़ी सी झालरवाली टोपी दिखाकर कोने में रखी एक लाश की तरफ़ इशारा करता।

उसे झिड़कने के बाद गार्ड ख़ुद पर ही झुंझला रहा था। उसे उससे हमदर्दी थी। लेकिन नाफ़रमानी के अंजाम से डर भी था। पता नहीं किन फाइलों में गुम होकर रह गया था आर्डर! मन बहलाने के लिए उसने उसने रेडियो सेट ऑन किया।

"... और आज के समाचारों में - जनप्रिय राजनीतिज्ञ एवं भूतपूर्व मुख्यमंत्री के अंतिम संस्कार को लेकर चल रहे विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया है। मामले की सुनवाई आज रात माननीय मुख्य न्यायाधीश के घर पर होने की संभावना है। कोर्ट का ऑर्डर के बाद ही ये तय होगा कि उनका अंतिम संस्कार कब और कहाँ किया जायेगा..."

वक़्त के थपेड़ों से ख़ुद मुर्दा हुई जा रही उस इमारत के कोने में रखी वह ढ़ाई-फुटी लाश शायद हँस रही थी।


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