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यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते
यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते
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© Anita Choudhary

Drama Inspirational

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घर में सुबह से ही गहमा-गहमी थी। परिवार के कुछ निकटजन भी पहुँचे थे। स्कूल जाते समय माँ ने हिदायत दे दी थी कि आज मध्यांतर में छुट्टी लेकर घर आ जाना, कुछ मेहमान आने वाले हैं। हाँ, एक बात और वे लोग अगर तुमसे पहले आ जाऐं तो उनके सामने से गुजरते समय नज़रें झुका कर ही निकलना। पपली ने पूछा भी कि कौन मेहमान आ रहे, लेकिन माँ ने उसे चुप करा दिया।

पपली मध्यांतर में घर लौटी तो बाहर अहाते में ही दो युवक बैठे थे। सकुचाई-सी और नजरें झुकाऐ वह घर में घुस गई। माँ ने ऐसा करने को क्यों कहा, यह उसकी समझ से बाहर था। खैर घर आते ही बुआ बोली "जा जाकर वह तेरा आसमानी रंग वाला सलवार सूट पहन ले और दुपट्टा जरा ढ़ंग से लेना। पपली बड़ी खुश, आज तो घर में ही वह इकलौता सूट पहनने को मिल रहा। दुपट्टा लेते समय बुआ की बात याद आ गई सो करीने से पिन लगा ली जैसे स्कूल की यूनिफार्म के दुपट्टे की लगाती है। बाहर आई तो माँ ने कहा "ले यह चाय की ट्रे ले जा, मेहमानों के लिए"। पपली ने एक बार माँ के चेहरे की ओर देखा। हमेशा तो रामबहादुर मेहमान लोगों को चाय पकड़ाता है फिर आज उसे क्यों यह काम दिया जा रहा। पपली के चेहरे पर असमंजस के भाव, माँ और बुआ दोनों साफ पढ़ पा रहीं थीं। वह चाय की ट्रे मेहमानों के सामने रख रही थी तो दादा जी बोले "बेटा मेरा चाय का गिलास नहीं लाई"। पपली ने कहा अभी लाती हूँ बाबा। कहकर अंदर आ गई लेकिन बाबा को चाय देने पपली नहीं रामबहादुर गया। पपली शुरु से ही कम बोलने वाली संकोची लड़की थी। तरह-तरह के प्रश्न उसके दिमाग में चल रहे थे मगर पूछे कैसे, किससे ? बुआ पपली को अंदर कमरे की खिड़की के पास ले गई वहाँ से वे युवक सामने ही दिखाई दे रहे थे। बुआ ने कहा "देखो, वह लड़का तुम्हे पसंद है ना जो स्लेटी रंग की शर्ट पहने है। हम तुम्हारे विवाह की सोच रहे हैं। भाभी की तबीयत कुछ ज्यादा ही नासाज़ रहने लगी है। तुम ठहरी घर की सबसे बड़ी बेटी। फिर दसवीं कक्षा की परिक्षा तो शादी से पहले हो ही जाऐगी। फिर देखो शादी में नये-नये कपड़ें, गहने भी तो मिलने वाले हैं और साड़ियाँ भी जैसी फिल्मों में हिरोइन पहनती है। "पपली को और तो ज्यादा समझ नहीं आया लेकिन नये कपड़ें, गहने और साड़ियों का नाम आते ही चेहरे पर चमक आ गई और उसने शर्म से नज़रें झुका लीं। ग्रे कलर की शर्ट वाला लड़का भी सुन्दर था। चाय की ट्रे रखते समय उससे नज़रों का सामना भी हुआ था, यद्यपि दूसरा युवक भी ग्रे कलर के कपड़ों मे ही था लेकिन वह सफारी सूट में और फिर उसने तो नजर भर देखा भी नहीं था पपली को।

बुआ ने जाकर धीरे से माँ के कान में कुछ कहा और सभी के चेहरे खुशी से चमकने लगी। पपली भी खुश ही थी। घर में शादी की तैयारियाँ शुरु हो चुकी थीं। बुआ पपली को अपने साथ बाजार लेकर गई। उसकी पसंद के सब गहने, कपडे़ बनवाए गए।

इस बीच पपली ने थोड़ा बहुत जो फिल्मों में देखा या कहानियों में पढ़ा था विवाह के बारे में उसके सपने सजाने लगी। बाहर घूमना, फिल्मे देखना। पति-पत्नी के हाथ में हाथ डाले फिल्मी दृश्य उसकी आँखों के सामने घूमते रहते। उसके लिए विवाह का मतलब था नये कपडे़, मिठाईयाँ, लड़के लड़की के फोटो खिंचवाना और फिर बाहर घूमना, पिक्चर देखना।

विवाह का दिन भी आ ही गया। ससुराल से बहुत सुंदर लहँगा आया था। वह तो देखकर ही फूले नहीं समा रही थी। पहनकर तो बिलकुल गुड़िया लग रही थी। फेरों में कन्यादान को बैठी माँ झीने घूंघट में झुकी नजरों वाले उसके चेहरे को निहारे जा रहीं थीं, लेकिन माँ के चेहरे पर पश्चाताप भी था कि बच्ची की अभी उम्र ही क्या है, अभी तो अगले बरस सोलह की होगी। विवाह सम्पन्न हुआ। पपली ने एक बार भी नजर उठाकर अपने दूल्हे को नहीं देखा। विदाई हो गई। माँ ने विदाई के समय भी यही सीख दी कि वहाँ किसी के भी सामने सवाल जवाब न करना। सबका कहना मानना।

ससुराल में सास ने आरती उतारी, नेग चार किए। अंदर जब वह कमरे में नीचे बिछे गद्दे पर बैठी थी तो एक महिला आई और बोली "बहू बोलना नहीं है और न ही नजरें उठानी हैं। यहाँ गांव में नई बहू की सब बातें बनाते"। नये कपडे़, घूँघट और चुपचाप बैठे-बैठे पपली का दम घुट रहा था। लेकिन बोलना तो था ही नहीं। जो भी महिला आती घूँघट उठाकर मुँह देखती और चली जाती। पपली सबके पैर छूती मानो कोई गूंगी गुड़िया हो।

सोचने लगी फिल्मों में तो ऐसा कुछ नहीं देखा था उसने। फिर ये कैसा विवाह था ओर कैसा ससुराल। तभी उस स्लेटी कमीज वाले लड़के का चेहरा याद आ गया। अरे, अभी तो वो मिला भी नहीं। उसने कुछ राहत महसूस की।

थोड़ी देर में एक लड़की की आवाज से उसकी तंद्रा टूटी, "लो भाभी यह साड़ी पहन लो, लहँगे मे परेशानी हो रही होगी। "पास बैठी महिला बोली "हाँ, भई ये पढ़ी-लिखी लड़की है, कपडों का भी बोझ लगता होगा।" पपली ने तो कभी साड़ी पहनी ही नहीं थी। उसे क्या पता कैसे पहने, पल्लू ले। जैसे-तैसे लपेटकर पिन लगाई, लेकिन पिन पेटीकोट के साथ नहीं लगी थी सो वह भारी साड़ी खुलकर पैरों में गिर पड़ी जैसे ही वह उठकर चलने को हुई। आसपास खुसर-पुसर होने लगी। वह परेशान, ऐसा काहे का ब्याह, ऐसा पता होता तो हम कभी ब्याह नहीं करते। लेकिन अब क्या।

रात को अपने कमरे में बैठी थी, सब महिलाएँ जा चुकी थी तभी एक युवक ने प्रवेश किया, जैसे ही दरवाजे़ पर आहट हुई पपली की नजरें युवक के चेहरे पर पड़ी। लेकिन यह क्या, यह तो वह स्लेटी सफारी सूट वाला लड़का था।

न जाने क्यूँ वह गंगाधर के साथ सहज महसूस कर रही थी। गंगाधर भी उसे एक पल को भी यह महसूस नहीं होने देना चाहता था कि वह अनजान लोगों के बीच है। "तुम थक गई होगी ", सुनते ही पपली को लगा जैसे वो फिर अपने घर ही पहुँच गई हो। "हाँ, ये साड़ी मुझसे नहीं सम्भल पा रही और देखो ये घूंघट, हमने तो फिल्मों में हिरोइन को कभी ऐसे न देखा था। हाय दईया, पैर छूते-छूते हमारी कमरिया कीर्तन कर रही। न जाने कब से हम मुँह बांधे बैठी रही, जिसकी शादी होती उसे क्या चुप रहना पड़ता, हमें न पता था वरना हम तो एक जोड़ी नये कपड़ा में ही काम चला लेते लेकिन ब्याह नहीं करते"।

सारी दिनभर की व्यथा एक झटके से उगल बैठी पपली। गंगाधर नें अपनी लाई नाईटी उसे देते हुऐ कहा, "लो यह पहन लो और तुम आराम से सो जाओ। लेकिन यह केवल इस कमरे तक ही पहनने की है। सुबह तुम फिर से साड़ी पहन लो तभी बाहर निकलना।" पपली को वह हल्के गुलाबी रंग की नाईटी बहुत पसंद आई।

गंगाधर भी पास की ही खाट पर लेट गया, न जाने कब आँख लग गई। "अरेरेरेरे !!! सुनो तो ये साड़ी, इतनी लम्बी की कहाँ जरुरत होती।" पपली ने गंगाधर को झिंझोड़ा। गंगाधर ने अपनी बालिका वधु की साड़ी पहनने में मदद की।

"जब तक हम यहाँ रहेंगे साड़ी तुम्हें ही पहनानी होगी हाँ, कहे देते हैं। तुम्ही यहाँ लिवा लाऐ हो हमें"। गंगाधर के अधरों पर मुस्कान दौड़ गई।

अगले दिन सुबह सवेरे ही देवी-देवता पूजन और मेहमानों की विदाई, पपली को भी पगफेरे के लिए अपने मायके जाना था।

मायके में जैसे ही गाड़ी से नीचे कदम रखा पपली से पहले साड़ी की पाटली चरण स्पर्श करने लगी, गंगाधर को भी साड़ी बाँधनी कहाँ आती थी भला। माँ, बुआ, छोटी बहन को देखा, तो लगा मानो सूखती फसल को बारिश की बूंदों ने जीवनदान दे दिया हो। आँखों से आँसू बहने लगे, "माँ क्या ब्याह करना जरुरी होता ? ये साड़ी, ये घूँघट, दिनभर चुप्प बैठना, ये नहीं होता हमसे"। माँ की आँखों का ज्वार, जिसे शायद अब तक फुर्सत ही नहीं मिल पाई थी फूट पड़ने को, फूट पड़ा। "माँ, तुम ऐसे न रोओ, हमें साड़ी, घूँघट से कोई परेशानी नहीं"। पपली को लगा माँ उसके प्रश्न से दुखी हो रो रही।

समय को तो पंख लगे थे। गंगाधर की छुट्टियाँ बीत गई, पपली को साड़ी पहनना सिखाने, एक बहू को घर के तौर तरीके सिखाने में ही, उसे जाना ही पड़ेगा। लेकिन हाँ, पपली अब सहज महसूस करने लगी थी। कल रात की ट्रेन थी, पपली को पता चला तो कुछ उदास हो गई। सास उसके चेहरे के भाव स्पष्ट पढ़ पा रही थी।

"बेटा तुम आज जा रहे, मुझे भी भैया-भाभी के घर भात मीठा करने को जाना। सोच रही हूँ, अब थोड़ी गृहस्थी से निवृत हुई हूँ तो कुछ दिन तुम्हारे मामा-मामी के यहाँ ठहर जाऊँ। लेकिन घर में बहू नई-नई है, सो अकेले छोड़कर जाना भी ठीक नहीं। तू एक काम कर, इसको अपने संग ही लिवा ले जा। यहाँ अकेली का मन भी नहीं लगेगा।"

गंगाधर के पास अब कोई जवाब नहीं था।

सास ने घर गृहस्थी का कुछ जरुरी सामान साथ रखते हुऐ गंगाधर को कहा "तुम ऑफिस चले जाओगे तो बहू के पास ज्यादा काम नहीं रहेगा। इसका दाखिला भी कॉलेज में करवा देना। आगे आने वाला समय पढे़ लिखे लोगों का ही है। पढ़ लिख लेगी तो कल को अपने पैरों पर खड़ी हो पाएगी।" गंगाधर स्तब्ध था अपनी अनपढ़ माँ की बातों से।

दोनों अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गये। आने के तीसरे दिन मामा के यहाँ फोन किया माँ से बात करने के लिए। फोन मामा ने उठाया, पता चला माँ तो मामा के घर आई ही नहीं।

गंगाधर ने पपली का दाखिला पी.यू.सी. में करवा दिया।

ग्रेजूएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और आज पपली सरकारी नौकरी में है।

आज की सभी पपलियों को गंगाधर जैसा पति व गंगाधर की माँ जैसी सास मिले तो यह समाज "यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता" को चरितार्थ करता नजर आएगा।

कहानी नारी सशक्तिकरण शादी

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