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चौरानबे
चौरानबे
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© Shailendra Kumar

Tragedy

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पिछले दो मिनट में ये उसने चौथी बार करवट बदली थी, और अपनी थकी हुई आँखो को ज़ोर से भींच कर नींद की आग़ोश में जाने की बेकार कोशिश की थी, जो उसे वैसे ही चकमा दे रही थी जैसे उसके चेहरे से हँसी, और मन से चैन। परेशान मन, तकिए के नीचे दबी हुई एक तस्वीर उसने फिर बाहर निकाली और उसे निहारने लगा। ये उसकी बेटी की तस्वीर थी जो आने वाली २५ दिसम्बर को चार बरस की हो जायगी। धारव पिछले तीन साल से बस यही सोच कर जेल की सलाखों की पीछे दिन काट रहा था की कब वो अपनी छोटी सी बच्ची के साथ दोबारा खेल पायेगा , कब वो उसे अपनी गोद में उठा कर दुबारा झूमा पायगा, कब उसके नन्हे हाथ अपने गालों पे फिर से महसूस कर पायेगा। आज भी कुछ ऐसी ही यादों और कल्पनाओं ने उसे बेचैन कर रखा था। 

धारव की ये बेचैनी पिछले तीन महीनो में कई गुना बढ़ गयी थी, क्यूँकि यद्यपि उसकी सज़ा की अवधि समाप्त हो गयी थी, वो कारावास में ही था। क्यूँ मगर? सोच कर उसने अपने आप को कोसा। ऐसा नहीं है की इस क्यूँ का जवाब धारव को पता नहीं था, परंतु जो ‘क्यूँ’ उसके सर के अंदर घाव कर रहा था, वह ताथ्यिक नहीं अपितु मार्मिक था। क्यूँ उसने ऐसा काम किया जिसकी वजह से आज वो इस सीलन युक्त १० x १० की कोठरी में पड़ा हुआ है? क्यूँ तीन साल पहले वो अपने क्रोध के आवेग को ना संभाल सका? क्यूँ ३ साल के कारावास में अथक परिश्रम के बावजूद वह २५,००० रुपए नहीं जोड़ पाया था जिनका भुक्तान भी उसे अपनी कारावास सज़ा के अतिरिक्त करना था? जिसकी वजह से वह आज भी यहाँ लेटा हुआ है । क्यूँ उसकी पत्नी को घर चलाने के लिए दूसरों के घरों में काम करना पड़ रहा था? ये सब सोचते सोचते धारव की आँखो से पानी की धारें फूट पड़ी थीं, और हमेशा की तरह सख़्त गद्दे में जा समा रही थी।

धारव ख़यालों की इस धक्का मुक्की में सो भी गया था इस बात का पता उसे तभी चला जब वो सुबह उठा। नित्यकर्मो से मुक्त हो, व सुबह के नास्ते में ‘लज़ीज’ दलिया बेमन से खाकर, वो रोज़ की तरह लकड़ी की कुर्सियाँ बनाने के लिए जेल के कारख़ाने में जा बैठा था। थोड़ी ही देर में वो फिर से ख़यालों में पूरी तरह खो गया था, पर उसके हाथ, जिनका मानो अपना अलग अस्तित्व हो, मशीन की तरह चल रहे थे और हथौड़े से कीलों को लकड़ी के अंदर धकेल रहे थे। “धारव! अरे...” एक मध्यम क़द काठी का युवक, दूसरी दुनिया में विचर रहे धारव की ओर तेज़ी से बढ़ा आ रहा था।

“अरे भाई धारव” द्रश्यपटल पर आए नए युवक ने, धारव के कंधे पे हाथ रख कर बोलना शुरू किया। “भाई सुना है सरकार ऐसे बंदियो को छोड़ने वाली है जिन्होंने सज़ा पूरी कर ली है पर सिर्फ़ इसलिए नहीं छूट पा रहे हैं क्यूँकि वो चालान के पैसे नहीं दे पा रहे हैं।” लकड़ी को पीट रहे धारव के मस्तिस्क में जैसे ही इन शब्दों ने अर्थ बनाया, उसके हाथ से हथोड़ी छूट गयी, और फट्टी आँखों से उसने, रवि की ओर मुँह फिराया। मुस्कुराते हुए रवि ने अपना सर हाँ में हिलाया और फिर बोलना शुरू किया “भाई तुम तो इसी वजह से अब भी नहीं छूटे हो ना?” धारव के मुँह से एक पल के लिए शब्द ही नहीं फूट रहे थे, पर उसकी आँखो की चमक देख कर रवि को अपने पुष्टिकारक सवाल का जवाब मिल चुका था। “जाओ जा कर जेलर से ठीक से सारी बातें पता करो, मैंने तो उड़ती उड़ती ख़बर सुनी है।”

धारव ने पता किया, बात सच थी, सत्तारूढ़ पार्टी के वरिष्ठ नेता, जोकि काफ़ी समय से शय्याग्रस्त थे, के जन्मदिन के उपलक्ष्य में सरकार ने धारव जैसे बंदियो पर दया दिखाने का निर्णय लिया था। धारव की ख़ुशी का पारावार ना था। एकाएक जैसे उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो गयी थी। अब तो हर रोज़ वह एक नयी स्फूर्ति के साथ उठता, सारे काम करता, गाने गाता। और बार बार अपने साथियों को बताता की कैसे वो इस बार अपनी बेटी के जन्मदिन पर उसके साथ होगा, कैसे उसे गले लगा कर गोद में उठा कर यहाँ से वहाँ घूमेगा। उसके सभी साथी धारव के लिए बोहोत ख़ुश थे। आख़िरकार वो दिन भी कल आने वाला था, धारव ने जाने की तैयारी में दो दिन पहले से ही काग़ज़ के उन टुकड़ों को समेट लिया था जिनपे उसने बेटी की याद में कुछ लिखा था, या बनाया था।

आज तो पूरी रात उसे नींद ही नहीं आयी थी, जो की उसके लिए कोई अस्वाभाविक नहीं था, पर सिर्फ़ कारण अलग था। आज उसने रगड़ रगड़ कर नहाया, जैसे उस पानी से अपने शरीर के साथ साथ अंतर्मन को भी धो डालेगा, और कभी ऐसी ग़लती दोबारा नहीं करेगा जिसेक कारण उसे जेल की सलाखों के पीछे आना पड़ा। अपने आप को ख़यालों की आँधी से बाहर निकाल और फटाफट तैयार हो, वह जेलर के ऑफ़िस की तरफ़ काग़ज़ी कार्यवाही करने जा पहुँचा।

ऑफ़िस की तरफ़ जाने वाले रास्ते के मुख्य दरवाज़े पर पहुँच कर उसे रुकना पड़ा। शायद वह उत्साह में समय से पहले आ गया था। वह वहीं खड़ा रहा। अंततः, उससे जेलर बाहर से आ अपने कक्ष की ओर जाता हुआ दिखायी दिया। जेलर की नज़र भी धारव की ओर पड़ी, और उसे अचानक से कुछ याद आया जिसने उसकी चाल धारव की ओर मोड़ दी। धारव के चेहरे पे ख़ुशी की मुस्कान और लम्बी हो गयी थी। जेलर उसके पास आ कर रुका, धारव को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला “अरे मैं तुम्हें बताना भूल गया” फिर सिर्फ़ एक पल रुक कर बोला “पर तुम्हें भी तो पता करने आना चाहिए था।” जेलर एक और पल रुका फिर अपनी रूखी आवाज़ में बोला “छूटने वाले बंदियो की सूची में तुम्हारा नम्बर चौरानबे था। पर क्यूँकि ये नेताजी का तीरांनबेवा जन्मदिन हैं, तो उसे मनाने के लिए तीरांनबे क़ैदी ही आज़ाद किए जा रहें हैं।” जेलर ने धारव की तरफ़ निर्भाव से देखते हुए अपनी उँगलिया यूँही दरवाज़े पे बजायी और वापस अपने कक्ष की ओर मुड़ गया। 

धारव के हाथ में भींचे हुए काग़ज़ के टुकड़े ज़मीन पर बिखर गए - काश नेताजी एक साल पहले पैदा हुए होते, सोचते हुए, वही कोरे पानी की धार उन्ही जानी पहचानी आँखो से फिर बह निकली थी।

जेल बेटी कागज़

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