पहचान

पहचान

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“क्या सोचते रहते हो ?” सवाल सुन आफ़ताब ने यथार्थ में कदम रखा सामने सोफे पर बैठी श्रीमती जी मोबाइल से आँख उठाकर उसके तरफ देखा । “कुछ ख़ास नहीं !” आफ़ताब ने जवाब दिया “अब क्या बताऊँ तुम्हें !” और लम्बी सांस ली। अनमने ढंग से जवाब सुन, एक पल आफ़ताब के उतरे चेहरे पर निगाह डाली और कुछ समझ कर आगे बात ना बढ़ाने की सोच अपने मोबाइल में फिर व्यस्त हो गईं। आफ़ताब एक गहरी सांस ले फिर विचारों में खो गया ।

आफ़ताब भी अजीब-सी उहापोह में उलझ सा गया था। समझ नहीं आ रहा था। बस किंकर्तव्यविमूढ़-सा व्योम में फँस कर रह गया था।

बहुत ही नाजों से पला था वो, घर में सबसे छोटा जो था। आगाध वात्सल्य से नवाजा गया, मम्मी पापा से ही नहीं, भाई, दीदी से भी, भरपूर मिला। समझता था वह सब इसलिए वे सब आफ़ताब की दुनिया थे।

कैसे सैलाब आता है ? और तबाही क्या होती है ? इसका अहसास तो उस दिन हुआ जब एक अनजानी-सी जानी-पहचानी आवाज ने भाई के दुर्घटनाग्रस्त होने का कहर उसपर बरपाया। दो दिन तक न जाने कितनी बार जिंदगी की भीख माँगी थी पर उसकी रज़ा के आगे मोह की गुहार की एक न चली थी। आँखों के सामने धू-धू का मंज़र आज भी आँखों के सामने जब भी नाचता है, उसे खालीपन का एहसास दिलाये बिना नहीं रहता। आफ़ताब के वो कदम जो दौड़ कर भाई के दहलीज़ पर पहुँचने के लिए बेचैन रहते थे, उन्हें शायद उनको अब काठ मार गया था। बरसों बीत गए।

“चाय पियोगे ?” श्रीमती जी ने पूछा। “हाँ !” आफ़ताब ने कहा और उठ कर कमरे में चहलकदमी करने लगा। चाय रखते हुए श्रीमती जी बोलीं “क्यों पापा की तरह इतना सोचते हो। सोचने से कुछ हुआ है। मुझे भी तो बताओ तो क्या उधेड़बुन में लगे हो ?”

पापा ! सुन एक ज्वार उठ-सा गया जो अपने साथ आँसुओं की झड़ी के आगमन का अहसास ले आया, गला रूँध-सा गया आफ़ताब का। वो तेज़ी से पलटा और टेबल पर रखे गिलास का पानी एक ही झटके में पी गया। कोशिश कर के भी मुस्कुरा न सका। भर्राई आवाज़ में बोला, “अब समझ में आता है की पापा क्यों हमेशा सोचते रहते थे।” दो पल के लिए श्रीमती जी रुकीं पर आफ़ताब कुछ और कह न पाया बस चाय उठा कर पीने लगा। श्रीमती जी ने उसे अकेला ही छोड़ना ठीक समझा-डर गयीं कि कहीं रो न पड़े आफ़ताब। उसे चाय पीता छोड़ अपनी चाय ले कर बच्चों के कमरे में चली।

अस्पताल तो चले गए थे पापा, पर जब डाक्टर ने भर्ती होने के लिए कहा तो बिलकुल तैयार नहीं हुए थे। “मुझे घर ले चलो, मैंने घर जाना है।” अब भी ये शब्द पीछा नहीं छोड़ते, आफ़ताब के रह-रह के गूँजते रहते हैं। आफ़ताब के लाख समझाने पर भी शायद नहीं समझे थे वे, क्योंकि गिरती हालत में सबसे पहले आफ़ताब को ही पहचानना भूल गए थे !!!! जिस के बल पर बस यही कहा था उन्होंने आफ़ताब से “भगोड़े हो तुम !” आज तक रहस्य हैं ये शब्द आफ़ताब के लिए। वो चले गए बिना पहचाने, आफ़ताब आज तक तरसता है, कोसता है अपनेआप को, न जाने कौन-सी गलती कर दी मैंने, बस उनकी सलामती के लिए ही तो इबादत की थी मैंने। अस्पताल न ले जाता तो जरूर भगोड़ा-सा जरूर होता। बस पहचान नहीं पाया कि आप घर से ही जाना चाहते थे। तभी तो लाख कहने पर भी कभी डाक्टर के पास नहीं गए, पर मम्मी की दवा लाना कभी नहीं भूले ! हाँ पापा ! आप लोगों के प्यार के साये में भगोड़ा-सा ही तो था मैं ! तूफान आये न आये पर आपने अपनी प्यारी-सी हथेलियों से मेरी लौ को हमेशा सहेज कर रखा। हमेशा मेरी ही सहूलियत का ध्यान रखा ! मैंने चिलचिलाती धूप देखी ही कहाँ थी, अब तो हकीकत की धूप सख्त है और कोई ओट भी नहीं है।

चाय की कुछ चुस्कियों के बाद चाय का कप को मेज़ पर रख कर अनायास ही अलमारी खोल दी आफ़ताब ने। सामने मम्मी की फोटो और उस पर हार। आफ़ताब की नज़र मम्मी की नज़र पर जा कर टिक-सी गईं।

आप तो अस्पताल जाना ही नहीं चाहती थीं पर खून चढ़वाने के लिये तो जाना ही पड़ा था। सोचा था कि अब जब आप अस्पताल से आओगी तो और ज्यादा ख्याल रखूँगा आपका फिर ताकि ऐसी नौबत ही न आये कि अस्पताल बार-बार जाना पड़े आपको। आप तो नाराज़ ही हो गईं मुझसे !! डाक्टर हमेशा कहता था कि हमसे तो बात करती हैं, पर जब आपसे में मिलने आता तो आँख ही नहीं खोलती थीं !! आता, आपसे एकतरफा बात करता पर आपने न मुँह खोला न आँखे, कितना मायूस हो कर लौटता था मैं, पर किसी से कभी ये जिक्र हीं न कर पाया-क्योंकि डॉक्टरों हमेशा यही कहते रहे, सब ठीक है। घर जाकर सब नार्मल हो जायेगा।

कितनी खुशी से घर वापस लाया था आपको। आपने तब भी सबसे बात की पर मुझसे नहीं। शायद मेरी तरफ देख कर मुझे पहचाना ही नहीं। सबने उस जंगली-सी बिल्ली दिखा कर आपको घर आने का अहसास दिलाया था आपको, और मैं अलग-थलग-सा, एक हारे हुए जुआरी की तरह, अपनी आख़िरी पहचान भी खो चुका था। अगला दिन कैसे भूल सकता हूँ आपने सुबह कितने प्यार से देखा था-नमस्ते का जवाब भी दिया था-चाय पियोगी ? का जवाब भी दिया था पर, फिर बिना देखे ही चलीं गईं ? नार्मल ??? नहीं पहचान पाया था आपके सवाल को-“नवरात्र कब है बेटा ?” उस दिन नवरात्र का ही तो पहला दिन था न ? था न माँ ?

एक लम्बी-सी आह भर कर आफ़ताब उहा-पोह में डूबता उतरता रहा। पपीहे जैसी प्यास लगी थी उसे, कि उसे राजा बेटा कह फिर बुलाए, घर से निकलते जिसके वो पैर छुए, घर में कदम रखते ही जो कहे, "आ गया बेटा ! बहुत देर हो गई !" अजब सा व्योम था, अजब सा सन्नाटा ! एक पहचान के अंत ??

अब कर भी क्या कर सकता हूँ ? जब थे तो कितना कम वक्त दे पता था मैं, अब जब नहीं है तो हर वक्त सोचता रहता हूँ !! मेरी मजबूरी को कितना समझते थे आप सब !! मुस्कुरा कर अपने एकाकीपन को सिर्फ इसलिए ढक लेते थे ताकि मैं परेशान न हो जाऊँ। लाख पूछने पर सिर्फ ये ही कहते रह गए, "सब ठीक है बेटा, परेशान मत हो।" आज परेशान हूँ, आपके वात्सल्य की ललक है, पर आप कहाँ हो ?

रे मन ! अब तो मान जाओ ! बहुत--सी अच्छी स्मृतियाँ हैं अब उनका सहारा ले ले ! जो तुम पर बीती है वो उन पर भी बीती थी, पर क्या कभी तुम्हें कभी ये अहसास भी होने दिया ? उन्हें तो दिन और तारीख का भी गुमान नहीं रहा होगा ! अगर रहा भी होगा तो कभी तो कभी ज़ाहिर नहीं किया ? किया भी होता तो कितना मेरी समझ आता ? सनातन से चली आ रही से प्रथा, पहचान के मिटने की ! अब निभाने की बारी मेरी है। गहरी सांस ले आफ़ताब ने अलमारी को बंद की और बची चाय को पी कर प्याली “पापा, सुनो प्लीज ! ये सवाल समझा दो ना।” “आया बच्चा !”आफ़ताब अपने को सँभालते हुए एक नई पहचान की ओर बढ़ चला।


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