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साजिशों के शिकार
साजिशों के शिकार
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© Ashish Aggarwal

Inspirational

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किसी काम के ना रहे, बेकार हो गए,

जो दिल साजिशों के शिकार हो गए|

 

वो ज़ख्म ठीक होने का नाम नहीं लेते,

जिनमें तीर सीने के आर-पार हो गए|

 

आदतें नहीं बदलती ना ही बदले फितरतें,

बस वो लोग अब और होशियार हो गए|

 

साजिशों ने सीधे-सादे को बुरा बना दिया,

उसके सफ़ेद कपड़े कब के दागदार हो गए|

 

तू किससे वफ़ा की उम्मीद रखेगा नादान,

जब तेरे अपने लिए फैसलें गद्दार हो गए|

 

जो सदा सजदा करते रहें अपनी कला को,

वही जावेद अख्तर और गुलज़ार हो गए|

 

उन्हें उनकी गलतियों का एहसास करवाया,

अब उनकी नज़रों में हम कसूरवार हो गए|

 

खुद ही दगा करके दिल से निकाल दिया,

इश्क की नौकरी से हम बेरोज़गार हो गए|

 

इस कदर से बेकदर हुए हमारे जज़्बात,

रद्दी के भाव बिकने वाले अखबार हो गए|

 

यूं सदमों के सिलसिले चले ज़िन्दगी में,

कि उम्र भर के लिए हम बीमार हो गए|

 

कोई तोड़ गया हमें इतनी बुरी तरह से,

अब टुकड़ों में जीने के आसार हो गए|

 

रिश्तों से दिल लगाना छोड़ दे अशीश,

शर्मसार तेरे किए सारे ऐतबार हो गए|

साज़िश शिकार

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