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Saurabh Gupta

Abstract

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Saurabh Gupta

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फासले

फासले

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मेरे लफ़्ज़ों में है सच्चाई

बातें ये मेरी आंखों ने बताई

अब चाहे तू माने या ना माने

मैंने मेरी दोस्ती पूरे सलीके से है निभाई


तेरे झूट में सिसकते हुए जी लिआ

तेरी बेखबरी को नादानी समझ के पी लिया

अब चाहे तू जाने या ना जाने

मेरे दिल के टूटे हिस्सो को मैंने अब सी लिया


तेरी आदत ना चाहते हुए छोड़ दी

तेरी तरफ ले जाने वाली हर राह मोड़ दी

अब चाहे कर तू जतन जितना भी बुलाने के

तेरी इबादत की प्रतिमा मैंने अब तोड़ दी


मेरी परछाई भी अब मुझसे है थक चुकी

ये ज़िन्दगी भी जाके है कहीं रुक चुकी

अब चाहे तू मुझे अपना ही क्यूं ना माने

तेरी रूह मेरी रूह में है कहीं खो चुकी।


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