वृंदावन में होली
वृंदावन में होली
होली के दिन हैं और वृंदावन के कृष्ण मंदिर में मंगला आरती का समय, दीपरश्मियों से आलोकित प्रांगण और कृष्ण की विश्वमोहिनी छवि। मैं इस दिव्यता का रसास्वादन कर ही रही थी कि एक ज़ोर की आवाज़ से तंद्रा भंग हुई।
“चल हट बुढ़िया यहां से।"
क्रोधित पुजारी उसी विधवा को बोल रहा था, जिसको मैं लगभग रोज़ मंदिरों की दीवारों को सहलाते देखती थी और कई बार इस क्रिया का कारण भी पूछा था। वह वृद्धा पीछे हट गई और बाहर को चल दी। मैं भी श्रांतमना उसके पीछे चल पड़ी। वह मंदिर की दीवारों को अपने कमज़ोर हाथों से छूते हुए आगे बढ़ रही थी।
मैंने पास जा कर नमस्कार किया और बोली,“पुजारी का व्यवहार खराब लगा।“
उसने मुस्कुरा कर मैली साड़ी से सिर को ढका और बोली, ”घाट जा रही हो?”
मेरा कोई इरादा नहीं था लेकिन मैं चल पड़ी। अंततः, यमुना घाट पर हम बैठ गए।
“आपके वृंदावन आने का कारण पति का स्वर्गवास...”
“नहीं।“
मेरी उत्कंठा देख वह बोली,”पति तो शादी के दो साल बाद ही बैकुंठ सिधार गए थे। एक बेटी है राधा।“
“कहां रहती है?”
“वह मर चुकी है।“
मैं स्तब्ध उसको देखने लगी।
“मेरी प्राणाधार थी। ईंट भट्ठे पर काम करके उसको पालती थी। उस समय लगभग पांच साल की थी।“
“फिर?”
“एक दिन भट्ठे पर खेलती हुई वह खोल के ढक्कन पर चढ़ गई और वो टूट गया। मेरे सामने ही उसका अग्निदाह हो गया।“
मैं द्रवित हो गई सुनकर।
वृद्धा फिर बोली,” जो ईंटे उस दिन भट्ठे में तप रहीं थीं, वो वृंदावन आईं थीं, किसी मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए। बस, मैं सीधे यहां आ गई, अपनी राधा के पास।“
घाट के पास बने मंदिरों को देख वृद्धा बोली, “मेरी राधा इन मंदिरों की दीवारों में बसी है। दुनिया वृंदावन आती है कृष्ण से संरक्षण प्राप्त करने। मेरी बेटी की प्रतिष्ठा तो कृष्ण से भी ऊंची है, उसने तो कृष्ण को ही संरक्षण दिया हुआ है।“
