वो शाम
वो शाम
रोज की तरह आज भी मैं शाम 4 बजे से ही पीपल पेड़ के चबूतरे पर बैठा,पुराने दिनों को याद कर रहा था । जब मैं और निशा यह खेला करते थे। कुछ दिनों पहले मुझे उसका खत मिला था खत में लिखा थबकी वो अगले शनिवार को वापस आयेगी ।हां अखिरकार शहर पढ़ने गए उसको करीब 5 वर्ष हो गए थे। हर शाम की तरह ये शाम आम नहीं थी l आज मैं इंतजार में था,यही कोई 5: 15 के आस पास बस आ जाया करती थी । पर आज समय आगे निकल चुका था , ठंड में तो अंधेरा भी जल्दी हो जाता है। कुछ दूर पर एक गांव की टोली ने अपनी बैठक जमा ली थी और साथ ही आग भी सुल्लका ली। आग की मदद ठंड से बचने के लिए ली जा रही थी और इधर आग की लपटों के साथ मेरी कसक और भी बढ़ती जा रही थी। कुछ देर में बस भी दिख गई ,बस रुकी , मेरी धड़कने भी तेज हो गई थीं,पर निशा उस बस में नहीं थी..........l
कुछ दिनों बाद एक खत आया जो की निशा का था उसके सुंदर अक्षरों में लिखा था , "माफ करना इस बार भी मैं नही आ पाऊंगी मुझे यहां नौकरी मिल गई है".
