वो एक दिन
वो एक दिन
वो एक दिन
लेखक: विजय शर्मा एरी
सुबह की पहली बस हमेशा की तरह खचाखच भरी थी। मानव ने किसी तरह दरवाजे के पास खड़े होकर अपना बैग सीने से चिपकाया और खिड़की से बाहर देखने लगा। दिल्ली की सर्द हवा अभी भी काँच पर धुंध बना रही थी। उसका दफ्तर नोएडा में था, एक छोटी-सी प्राइवेट कम्पनी। पगार मामूली, सपने उससे भी छोटे।
बस जैसे ही हाईवे पर चढ़ी, ड्राइवर ने अचानक ब्रेक मारा। सामने वाली लेन से एक सफेद सेडान ने अचानक यू-टर्न लिया था। टक्कर जोरदार हुई। बस का अगला शीशा चटक गया, कार का बोनट मुंह बाए खड़ा था।
मानव बस से उतरा तो सबसे पहले उसने कार के अंदर झाँका। ड्राइवर सीट पर एक लड़की थी, सिर स्टियरिंग से टकराया हुआ, खून माथे से बह रहा था। उसका बैग फट गया था, कागज-पत्र बिखरे पड़े थे। मानव ने दरवाजा खोला और लड़की को बाहर निकाला। उसका नाम मानसी था, ड्राइविंग लाइसेंस पर लिखा था।
“हॉस्पिटल… जल्दी…” उसने किसी तरह ऑटो वाले को पकड़ा और मानसी को गोद में उठाकर बैठ गया।
अस्पताल में डॉक्टरों ने कहा, “सिर पर गहरी चोट है, कुछ घण्टे क्रिटिकल हैं।”
मानसी के पास फोन नहीं था, कोई आईडी नहीं बची थी जो खून से सनी न हो। पुलिस आई, पूछताछ की, चली गई। मानव पूरा दिन वहीं बैठा रहा। उसने अपने ऑफिस में छुट्टी का मैसेज डाला, घर पर कहा, “देर हो जाएगी।”
शाम सात बजे मानसी को होश आया। उसकी आँखें खुलीं और उसने चारों तरफ देखा। फिर मानव की तरफ।
“मैं… कौन हूँ?”
मानव ने उसका हाथ थामा।
“डरो मत… मैं तुम्हारा अपना हूँ।”
मानसी ने फिर पूछा, “अपना… मतलब?”
मानव ने मुस्कुराने की कोशिश की। “मतलब मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
डॉक्टर ने बाद में बताया, “रेट्रोग्रेड एम्नेशिया। पूरी याददाश्त चली गई है। शायद महीनों लगें, शायद कभी वापस न आए।”
तीन दिन बाद मानसी को डिस्चार्ज मिला। उसके पास जाने को कोई घर नहीं था, कोई नाम-पता नहीं। मानव ने उसे अपने साथ घर ले आया। माँ-बाप हैरान थे।
“ये कौन बेटा?”
“मेरी मंगेतर है माँ। एक्सीडेंट में यादें चली गईं। अब मैं ही इसका सब कुछ हूँ।”
घर में एक नई बहू आ गई, जिसे अपना नाम तक याद नहीं था।
पहले कुछ दिन अजीब थे। मानसी हर चीज को छूकर देखती—चाय का कप, दीवार की घड़ी, बगीचे का गुलाब। हर बार पूछती, “ये मेरा है?”
मानव हर बार हँसकर कहता, “हमारा है।”
रात को वह अचानक उठकर रोने लगती। “मुझे कुछ याद नहीं… मैं खो गई हूँ।”
मानव उसे गले लगाता, पीठ पर हाथ फेरता। “तुम मेरे पास हो, यही तुम्हारा घर है।”
धीरे-धीरे मानसी ने नया जीवन सीख लिया। सुबह चाय बनाना, मानव की शर्ट में बटन टांकना, बाजार से सब्जी चुनना। पड़ोसन से हँसकर बात करना। लोग कहते, “कितना प्यार है इन दोनों में।”
और मानव? वह सचमुच मानसी से प्यार करने लगा था। उसकी हर मुस्कुराहट उसके लिए नया सूरज थी।
एक शाम मानव ऑफिस से लौटा तो दरवाजा खुला था। बेडरूम में मानसी बैठी थी। सामने ढेर सारे पुराने अखबारों के कटिंग बिखरे थे। एक हेडलाइन बड़ी-बड़ी अक्षरों में:
“दिल्ली की बेटी मानसी गुप्ता लापता, मंगेतर राज वर्मा बेकसूर”
मानसी ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब खालीपन नहीं था।
“हाय मानव… या मुझे राज कहूँ?”
मानव के पैर जम गए।
मानसी ने एक कटिंग उठाई। “तुमने बहुत मेहनत की थी ना, सारे सबूत छिपाने में? पर तुम भूल गए थे कि मेरी याददाश्त गई थी, मेरी आदतें नहीं। मैं हमेशा अपना सामान सबसे ऊपरी शेल्फ पर रखती हूँ। वहीं मिला सब कुछ।”
मानव की आवाज नहीं निकली।
“मानसी… मैंने सिर्फ़ तुम्हें खुश देखना चाहा था…”
मानसी उसके पास आई। उसने मानव का चेहरा हाथों में लिया और बहुत प्यार से, बहुत दर्द से कहा,
“तुमने मुझे बचाया तो था, पर मेरे राज को मार दिया। छह महीने मैंने तुमसे सच्चा प्यार किया। पर अब याद आ गया कि मेरा पहला प्यार कोई और था। तुमने उसे मेरे दिमाग से मिटा दिया।”
मानव रो पड़ा। “मैंने सोचा था तुम मेरे साथ खुश रहोगी…”
मानसी ने उसका माथा चूमा। आखिरी बार।
“मैं खुश थी। पर चोरी की खुशी ज्यादा दिन नहीं चलती।”
उस रात मानसी चली गई। बिना कुछ लिए। सिर्फ़ एक पुराना लिफाफा और वो फोटो, जिसमें गोवा की बीच पर राज और मानसी हँस रहे थे।
मानव अकेला रह गया। उसी घर में, जहाँ हर कोने में मानसी की हँसी बसी थी। अब सिर्फ़ गूँज रह गई थी।
कई साल बाद।
मानव वही पुरानी बस में बैठा था। अचानक बस रुकी। सामने एक कार ने यू-टर्न लेते हुए ब्रेक मारा। कार का शीशा नीचे हुआ। ड्राइवर ने मुस्कुराकर कहा,
“सॉरी भैया… गलती हो गई।”
मानव ने उसे देखा। चेहरा जाना-पहचाना सा था।
पर नाम याद नहीं आया।
कार चली गई। मानव बस में बैठा रहा।
उसके दिल में बस एक सवाल रह गया—
“क्या मैं उसे जानता था…?”
जवाब कभी नहीं मिला।
क्योंकि कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो कभी खत्म नहीं होते।
बस बदलते रहते हैं।
और हम उन्हें “वो एक दिन” कहकर याद रखते हैं।
समाप्त
(शब्द संख्या: १५०२)
