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Vijay Erry

Inspirational Others

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Vijay Erry

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तीसरा पहर

तीसरा पहर

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-तीसरा पहर 



प्रस्तावना

तीसरा पहर — दिन का वह समय जब सूरज अपनी तपिश खोने लगता है, खेतों में काम करने वाले किसान घर लौटने की तैयारी करते हैं, और गाँव की गलियों में बच्चों की किलकारियाँ गूँजती हैं। यह पहर अक्सर थकान और विश्राम का होता है, लेकिन कभी-कभी यही समय जीवन की सबसे गहरी दस्तक बन जाता है।  


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पहला दृश्य: नीम की छाया

रामकिशन अपने आँगन में बैठा था। नीम की शाखों से छनकर आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी आँखों में चिंता थी। बेटी सुहानी महीनों से शहर में पढ़ रही थी, पर कोई खबर नहीं।  


गीता ने रोटियाँ सेंकते हुए कहा, “तुम्हें चिंता करने की आदत है। लड़की पढ़ने गई है, लौटेगी तो गाँव का नाम रोशन करेगी।”  


रामकिशन ने धीमी आवाज़ में कहा, “नाम रोशन करने से पहले घर की रोशनी बुझ न जाए।”  


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दूसरा दृश्य: शहर की खिड़की

सुहानी हॉस्टल की खिड़की से बाहर देख रही थी। तीसरे पहर की धूप उसके कमरे में फैल रही थी। किताबें खुली थीं, पर मन कहीं और था।  


आरव, उसका मित्र, पास आया और बोला, “तुम्हें पता है, तीसरा पहर सबसे सच्चा होता है। इसमें न सुबह की जल्दबाज़ी होती है, न रात की थकान। यही समय है जब दिल की आवाज़ सबसे साफ़ सुनाई देती है।”  


सुहानी मुस्कुराई। उसे लगा कि आरव की बातों में कविता है।  


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तीसरा दृश्य: चौपाल की चर्चा

गाँव के चौपाल पर बुज़ुर्ग बैठे थे। तीसरे पहर की दस्तक उनके लिए स्मृतियों की खिड़की थी। कोई अपने जवान दिनों की कहानियाँ सुनाता, कोई पुरानी फसल की यादें।  


रामकिशन भी वहाँ पहुँचा। उसने सुना कि लोग कह रहे हैं — “अब गाँव बदल रहा है, बच्चे शहर जा रहे हैं, खेत सूने हो रहे हैं।”  


रामकिशन के मन में दस्तक और गहरी हो गई। उसने सोचा, “क्या तीसरे पहर की तरह गाँव भी ढलान पर है?”  


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चौथा दृश्य: पत्र की दस्तक

शाम ढलने से पहले डाकिया आया। उसके हाथ में एक पत्र था। गीता दौड़कर आई। पत्र सुहानी का था।  


उसने लिखा था —  

“प्यारे माँ-पापा,  

तीसरे पहर की धूप में जब मैं खिड़की से बाहर देखती हूँ, तो नीम की छाया याद आती है। यहाँ शहर में सब कुछ तेज़ है, पर मन को सुकून वही गाँव देता है। मैं जल्द ही छुट्टियों में लौटूँगी।  

आपकी सुहानी।”  


पत्र पढ़ते ही आँगन में जैसे नई रोशनी फैल गई।  


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पाँचवाँ दृश्य: वापसी

छुट्टियों में सुहानी लौटी। तीसरे पहर का समय था। नीम की छाया में बैठकर उसने आरव की कविताएँ सुनाईं। गाँव के बच्चे इकट्ठा हो गए।  


रामकिशन ने देखा कि उसकी बेटी अब सिर्फ उसकी नहीं रही, वह गाँव की भी हो गई है। उसकी आवाज़ में उम्मीद थी, उसकी आँखों में भविष्य।  


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छठा दृश्य: संघर्ष और सवाल

गाँव में बिजली अक्सर चली जाती थी। उस दिन भी तीसरे पहर की दस्तक के साथ अंधेरा फैल गया। सुहानी ने कहा, “पापा, गाँव को बदलना होगा। हमें रोशनी चाहिए, हमें शिक्षा चाहिए।”  


रामकिशन ने गहरी साँस ली। “बेटी, यह सब आसान नहीं। पर अगर तुम्हारे जैसे लोग आगे आएँगे, तो शायद गाँव का तीसरा पहर भी उजाला बन जाएगा।”  


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सातवाँ दृश्य: आरव का आगमन

आरव भी छुट्टियों में गाँव आया। उसने चौपाल पर कविता सुनाई —  

“तीसरे पहर की दस्तक है,  

मन के दरवाज़े पर खटखटाहट है,  

छाया और रोशनी का संगम है,  

जीवन का सबसे सच्चा क्षण है।”  


गाँव के लोग चुपचाप सुनते रहे। किसी ने कहा, “यह लड़का शहर का है, पर इसकी आवाज़ गाँव की मिट्टी जैसी है।”  


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आठवाँ दृश्य: नई शुरुआत

सुहानी और आरव ने गाँव के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। तीसरे पहर का समय अब किलकारियों और पढ़ाई से भरने लगा। नीम की छाया में किताबें खुलतीं, कहानियाँ सुनाई जातीं।  


रामकिशन ने देखा कि उसकी बेटी ने गाँव को नया जीवन दिया है। तीसरे पहर की दस्तक अब उम्मीद की घंटी बन गई थी।  


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समापन

तीसरे पहर की दस्तक कभी उदासी लाती है, कभी उम्मीद। यह समय हमें याद दिलाता है कि जीवन की छाया और रोशनी साथ-साथ चलती हैं।  


रामकिशन ने नीम की ओर देखा और मुस्कुराया। उसे लगा, तीसरे पहर की दस्तक दरअसल जीवन की पुकार है — जो कहती है, “रुकना नहीं, आगे बढ़ना है।”  


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