किराये के मकान की यादें
किराये के मकान की यादें
लेखक: विजय शर्मा एरी
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किराये के मकान की यादें
1.
ज़िंदगी के सफ़र में कई ठिकाने आते हैं। कुछ ठिकाने स्थायी होते हैं, तो कुछ अस्थायी। किराये का घर उन्हीं अस्थायी ठिकानों में से एक है, जो अपने भीतर स्थायी यादों का खज़ाना समेटे रहता है। मैं जब भी पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो उस छोटे-से किराये के घर की दीवारें, आँगन और खिड़कियाँ आज भी मेरे दिल में जीवित हो उठती हैं।
2.
वह घर शहर के पुराने मोहल्ले में था। संकरी गलियाँ, बच्चों की किलकारियाँ, और हर शाम चाय की दुकानों पर होती बहसें उस मोहल्ले की पहचान थीं। घर बड़ा नहीं था, पर उसमें अपनापन था। टूटी हुई खिड़की पर टंगे परदे, दीवारों पर हल्की दरारें, और छत पर टपकते पानी के निशान — सब मिलकर उसे एक जीवंत चरित्र बना देते थे।
3.
किराये के घर में रहने का मतलब था सीमित साधनों में जीवन को सँवारना। हर महीने किराया चुकाने की चिंता रहती, पर उसी चिंता के बीच परिवार की हँसी-खुशी भी पलती। माँ का रसोई में गुनगुनाना, पिता का अख़बार पढ़ते हुए गंभीर चेहरा, और बच्चों का शोरगुल — सब उस घर की आत्मा थे।
4.
उस घर का आँगन छोटा था, पर उसमें बड़े-बड़े सपने पलते थे। गर्मियों की रातों में हम सब वहीं चारपाई डालकर सोते। आसमान में टिमटिमाते तारे देखते और भविष्य के सपनों की बातें करते। कभी बिजली चली जाती तो लालटेन की रोशनी में कहानियाँ सुनाई जातीं।
5.
बरसात के दिनों में उस घर की छत से पानी टपकता था। बाल्टियाँ और बर्तन रखकर हम उस टपकन को रोकने की कोशिश करते। पर वही टपकन हमारी हँसी का कारण भी बन जाती। बच्चे उसमें खेलते, और माँ कहती — “ये घर भले ही किराये का है, पर इसमें हमारी खुशियाँ किराये की नहीं।”
6.
पड़ोसियों के साथ रिश्ते भी उसी घर की यादों का हिस्सा हैं। दीवारें भले ही अलग थीं, पर दिल जुड़े हुए थे। कोई सब्ज़ी दे जाता, कोई दवा। त्योहारों पर मिठाइयाँ बाँटी जातीं। किराये का घर हमें सिखाता था कि असली संपत्ति रिश्तों की होती है, न कि दीवारों और छतों की।
7.
पढ़ाई के दिनों में मैंने उसी घर की खिड़की के पास बैठकर किताबें पढ़ीं। बाहर से आती बच्चों की आवाज़ें, गली में बजते रेडियो के गाने, और भीतर माँ की पुकार — सब मिलकर एक संगीत रचते थे। उस संगीत ने मेरी कल्पना को पंख दिए।
8.
किराये के घर में अक्सर सामान सीमित होता है। पर वही सीमितता हमें सिखाती है कि ज़िंदगी की असली ख़ुशी वस्तुओं में नहीं, अनुभवों में होती है। टूटी कुर्सी पर बैठकर भी हम कहानियाँ सुनते थे, और पुराने रेडियो पर गाने सुनते हुए सपनों की दुनिया में खो जाते थे।
9.
समय बीतता गया। धीरे-धीरे हालात बदले। पिता ने थोड़ा बचत किया, और हम अपने घर की ओर बढ़े। पर जब उस किराये के घर को छोड़ने का दिन आया, तो आँखें नम हो गईं। दीवारों को छूकर लगा जैसे वे भी हमें रोक रही हों।
10.
आज जब मैं अपने स्थायी घर में बैठा हूँ, तो अक्सर उस किराये के घर की यादें मन को छू जाती हैं। वहाँ की हर दरार, हर टपकन, हर हँसी और हर आँसू मेरे जीवन का हिस्सा हैं। वह घर भले ही किराये का था, पर उसकी यादें हमेशा मेरी अपनी रहेंगी।
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निष्कर्ष
“किराये का घर की यादें” केवल एक कहानी नहीं, बल्कि जीवन का वह अध्याय है जो हमें सिखाता है कि असली घर दीवारों और छतों से नहीं बनता, बल्कि उसमें बसने वाले रिश्तों, सपनों और अनुभवों से बनता है।
