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Vijay Erry

Inspirational Others

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सफलता का मुल्य

सफलता का मुल्य

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सफलता की कीमत

लेखक: विजय शर्मा एरी


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प्रस्तावना

सफलता शब्द सुनते ही मन में चमक, ताली, सम्मान और उपलब्धि की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे जो धुंधली परतें हैं, वे अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। यह कहानी उसी परत को उजागर करती है—जहाँ सफलता की चमक के पीछे छिपा त्याग, अकेलापन और संघर्ष दिखाई देता है।  


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पहला अध्याय: सपना

अर्जुन एक छोटे कस्बे का लड़का था। पिता दर्जी का काम करते थे और माँ गृहिणी थीं। घर में आर्थिक तंगी रहती थी, लेकिन अर्जुन के सपने बहुत बड़े थे। वह चाहता था कि उसका नाम अख़बारों में छपे, लोग उसे पहचानें, और वह अपने माता-पिता को वह जीवन दे सके जो उन्होंने कभी सोचा भी न था।  


बचपन से ही पढ़ाई में तेज़ था। गाँव के स्कूल में जब भी कोई प्रतियोगिता होती, अर्जुन पहला स्थान लाता। शिक्षक कहते—“यह लड़का आगे जाकर बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”  


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दूसरा अध्याय: संघर्ष की शुरुआत

कॉलेज में दाख़िला लेने के लिए शहर जाना पड़ा। वहाँ की ज़िंदगी अलग थी—तेज़ रफ़्तार, प्रतियोगिता और हर जगह पैसा। अर्जुन ने पढ़ाई के साथ-साथ छोटे-मोटे काम किए। कभी ट्यूशन पढ़ाई, कभी अख़बार बाँटे। रात को देर तक पढ़ाई करता और सुबह जल्दी उठकर काम पर निकल जाता।  


उसके दोस्त अक्सर कहते—“इतना क्यों मेहनत करता है? ज़िंदगी का मज़ा लो।”  

अर्जुन मुस्कुराकर जवाब देता—“मज़ा तो तब आएगा जब मैं अपने सपने पूरे करूँगा।”  


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तीसरा अध्याय: सफलता की सीढ़ियाँ

कड़ी मेहनत और लगन से अर्जुन ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। कैंपस इंटरव्यू में उसे एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिली। पहली बार जब उसने मोटी तनख़्वाह का ऑफ़र लेटर हाथ में लिया, तो आँखों में आँसू आ गए। उसे लगा—“अब मेरी ज़िंदगी बदल जाएगी।”  


कुछ ही सालों में अर्जुन ने तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ लीं। कंपनी में उसका नाम सम्मान से लिया जाने लगा। वह प्रोजेक्ट लीडर बना, फिर मैनेजर। उसके माता-पिता गाँव में गर्व से कहते—“हमारा बेटा बहुत बड़ा आदमी बन गया है।”  


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चौथा अध्याय: कीमत का अहसास

लेकिन धीरे-धीरे अर्जुन को महसूस हुआ कि सफलता की चमक के पीछे एक अंधेरा भी है।  

- दोस्तों से मिलना-जुलना कम हो गया।  

- परिवार के साथ समय बिताने का अवसर नहीं रहा।  

- हर दिन मीटिंग, प्रोजेक्ट और डेडलाइन का दबाव।  


एक दिन माँ ने फोन पर कहा—“बेटा, तू बहुत बड़ा आदमी बन गया है, लेकिन हमें तेरी हँसी बहुत याद आती है।”  

अर्जुन चुप हो गया। उसे लगा कि उसने अपने सपनों की कीमत अपने रिश्तों से चुकाई है।  


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पाँचवाँ अध्याय: अकेलापन

कंपनी में सफलता के बावजूद अर्जुन के भीतर खालीपन बढ़ता गया। वह अक्सर देर रात ऑफिस से लौटता और अकेले कमरे में बैठकर सोचता—“क्या यही है सफलता? क्या यही है वह सपना जिसके लिए मैंने सब कुछ त्याग दिया?”  


उसके दोस्त शादी कर चुके थे, परिवार के साथ खुश थे। अर्जुन के पास पैसा था, लेकिन समय और अपनापन नहीं।  


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छठा अध्याय: मोड़

एक दिन कंपनी ने अर्जुन को विदेश भेजने का प्रस्ताव दिया। यह उसके करियर का सबसे बड़ा अवसर था। लेकिन उसी समय पिता बीमार पड़ गए। माँ ने कहा—“बेटा, हमें तेरी ज़रूरत है।”  


अर्जुन के सामने सबसे बड़ा सवाल था—क्या वह करियर चुने या परिवार?  

बहुत सोचने के बाद उसने निर्णय लिया कि सफलता की असली कीमत रिश्तों को खोना नहीं हो सकती। उसने विदेश जाने का ऑफ़र ठुकरा दिया और पिता के इलाज के लिए घर लौट आया।  


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सातवाँ अध्याय: नई परिभाषा

गाँव लौटकर अर्जुन ने महसूस किया कि सफलता केवल ऊँचे पद और पैसा नहीं है। सफलता वह है जहाँ आप अपने प्रियजनों के साथ हों, उनकी मुस्कान में अपनी मेहनत का फल देखें।  


उसने गाँव में एक छोटा टेक्नोलॉजी सेंटर खोला, जहाँ बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा दी जाती थी। धीरे-धीरे उसका काम फैलने लगा। गाँव के लोग कहते—“अर्जुन ने हमारे बच्चों की ज़िंदगी बदल दी।”  


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निष्कर्ष

अर्जुन ने समझा कि सफलता की कीमत केवल त्याग नहीं होनी चाहिए। असली सफलता वही है जो आपको और आपके प्रियजनों को खुशी दे।  


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संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता की चमक के पीछे छिपी कीमत को समझना ज़रूरी है। पैसा और पद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन रिश्ते, अपनापन और संतोष ही असली उपलब्धि हैं।  


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