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Dr RADHA BALMIKI

Tragedy

4  

Dr RADHA BALMIKI

Tragedy

वह भटकती रही

वह भटकती रही

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साधारण सी पुरानी धोती पहने परेशान हालत में वह ट्रेन की बोगी में इधर-उधर नंगे पांव घूम रही थी। बहुत घबराई हुई थी उसके माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट नजर आ रही थीं। थककर कभी बोगी के फर्श पर बैठ जाती, कभी टकटकी बांधे बर्थ पर बैठे मुसाफिरों को देखती रहती मानो भीड़ में किसी अपने के चेहरे को तलाश रही हो। जैसे ही बहेड़ी रेलवे स्टेशन आया चाय, समोसे-पकौड़ी वाले आवाज लगाते हुए आ गए। सभी पैसेंजर्स कुछ न कुछ खरीदने लगे मैंने भी पकौड़ी का एक दोना लिया यकायक मेरी नजर उसी बुजुर्ग महिला की ओर चली गई जो नीचे फर्श पर बैठी कातर दृष्टि से हम सबको देखे जा रही थी, और शायद वह भूखी भी थी। मैंने तुरंत अपने हाथ का दोना उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा "अम्मा जी! लो पकौड़ी खा लो।" वह बोली "नहीं बिटिया तुम खाओ तुमने अपने लिए लिया है।" मैंने कहा "अम्मा जी! मैं और ले लूंगी आप खा लो।" वह इन्कार करते हुए बोली "बिटिया मेरे पास पैसे नहीं है।" मैंने पर्स से कुछ पैसे निकाले और उसे देने लगी तभी वह आंखों में आंसू भर लाई और कहने लगी‌ कि "बिटिया हम भिखारी नहीं हैं ये पैसे हम नहीं ले सकते।" मैंने पूछा "क्यों नहीं ले सकतीं?"तब उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने बार-बार आग्रह करके उससे पूछा "अम्मां जी! आप रो क्यों रही हो? कुछ तो बताओ अपने बारे में ताकि मैं आपकी कुछ मदद कर सकूं।" तब वह रोते हुए बोली "हम अपने बेटे के पास गांव से लखनऊ आए रहे। हमारा बेटा हमारा समान लेकर हमसे बोला अम्मा थोड़ी देर इसी गाडी में ही बैठी रहो मैं ऑटो रिक्शा वाले से बातकर अभी आता हूं और तुम्हें घर लेकर चलता हूं। लेकिन बिटिया बहुत देर बाद भी वह नहीं आया इंतजार करते-करते गाडी चल पड़ी। हम दो दिन से इसी तरह एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी में इधर से उधर चक्कर लगाकर भटक रहे हैं। जल्दी बाजी में गाडी में चढ़ने के कारण हमारी एक चप्पल भी पैर से निकल कर कहीं गिर गई‌ एक चप्पल से हम क्या करते हमने दूसरी भी फेंक दी।"‌ यह कहते कहते वह फूट-फूटकर रो पड़ी।

मुझे उस बुजुर्ग महिला पर तरस आ रहा था। मैं उसे अपने साथ घर ले आना चाहती थी पर उसे एक ही रट लगी थी कि "मेरा बेटा स्टेशन पर मेरा इंतजार कर रहा होगा मुझे उसके पास लखनऊ जाना है।" वह अपने उस बेटे के पास लखनऊ लौट जाना चाहती थी जिसका पता भी वह ठीक से नहीं बता पा रही थी और जो शायद जानबूझकर उससे पीछा छुड़ाने के लिए लखनऊ स्टेशन पर ट्रेन में हमेशा के लिए अकेला छोड़कर चला गया था। लेकिन उस बुजुर्ग महिला को अपने गांव का पता अच्छी तरह से मालूम था।

मैं बरेली में अपनी मौसी से मिलकर पंतनगर वापस आ रही थी। बहेड़ी से पंतनगर ज्यादा दूर नहीं था कुछ ही देर में मैं अपने गंतव्य तक पहुंचने वाली थी एक बार फिर मैंने उस बुजुर्ग महिला से अपने साथ आने का आग्रह किया वह नहीं मानी तब मैंने उसके हाथ में पांच सौ का नोट पकड़ाकर कहा ठीक है अम्मा जी! आप नहीं आना चाहती हो तो मत आओ पर यह पैसे तो रख लो रास्ते में आपके काम आएंगे। 

इत्तेफाक से मैं जानती थी कि यही ट्रेन रात को 9:00 बजे लालकुआं जंक्शन से लखनऊ के लिए जाने वाली है, मैंने उनसे कहा "अम्मा जी! आप इस ट्रेन से मत उतारना इसी में बैठी रहना दो-तीन घंटे बाद यही ट्रेन लखनऊ के लिए बनकर जाएगी तब आप लखनऊ स्टेशन पर उतरकर अपने गांव जाने वाली गाड़ी किसी से पूछ कर पकड़ लेना और गांव चली जाना क्योंकि अब आपका बेटा आपको लेने नहीं आएगा।"

ट्रेन में बैठे अन्य मुसाफिरों ने भी उसकी दुःख भरी कहानी सुनकर जिससे जो बन पड़ा यह कहकर उसको जबरदस्ती पैसे पकड़ाए कि "अम्मा जी! आपको इन पैसों की बहुत जरूरत है पैसों के बगैर आप अपने घर तक नहीं पहुंच पाओगी इन्हें रख लो रास्ते में कुछ खा-पी लेना और अपने घर तक आराम से चली जाना क्योंकि आपका बेटा आपको लेने नहीं आएगा। आप उससे मिलने की उम्मीद छोड़ दो उसे आपको अपने साथ रखना होता तो आपको ट्रेन में अकेला छोड़कर क्यों जाता। आप अपने गांव का पता तो अच्छी तरह जानती ही हो इसलिए अपने गांव ही जाना कम से कम गांव वाले आपकी कुछ तो देखभाल करेंगे। आप अकेली यहां-वहां, कहां-कहां भटकती फिरोगी।"

इस तरह लगभग ढाई तीन हजार रुपए उस महिला के पास इकट्ठा गए थे। मैंने एक समझदार लड़के को लालकुआं से लखनऊ का टिकट लेकर देने की जिम्मेदारी दी और लालकुआं से पहले ही उस बुजुर्ग महिला को समझा-बूझाकर भारी मन से पंतनगर स्टेशन पर उतर गई। पर न जाने क्यों एक कसमसाहट लिए मै वहीं खड़ी रहकर दूर तक उस ट्रेन को जाते हुए देखती रही जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गई।


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