नियति का खेल
नियति का खेल
सृजन और विनाश प्रकृति का शाश्वत नियम है। जब सृजन होता है तो विनाश भी निश्चित है और जब विनाश होता है तो पुनः सृजन भी होता है। जिस प्रकार शीत और वर्षा ऋतु सृजन कम विनाश अधिक लेकर आतीं हैं, उसी प्रकार शीत के कठोर प्रहार के बाद वसन्त का आगमन होता है जो नया सृजन लेकर आता है। शीत के प्रहार से जो हरियाली पेड़-पौधे नष्ट हो चुके होते हैं। वसन्त के आते ही उनमें नई कोपलें फूटने लगती हैं। आम्रमंजरियों और रंगबिरंगे पुष्पों की सुगंध से धरा का कोना-कोना महकने लगता है। प्रकृति में चतुर्दिक हरियाली और बहार आ जाती है। प्रकृति का यह परिवर्तन पेड़-पौधों व प्राणियों में नवजीवन, नवस्फूर्ति तथा नवल ऊर्जा प्रदान कर देह में ओजपूर्ण उत्साह भर देता है, मानसिक वृत्तियां ऋतुओं की तरह परिवर्तनशील होने लगती हैं। मन में हरीतिमा का वास होने से प्राणियों का जीवन रंगबिरंगी अभिवृत्तियों से प्रफुल्लित हो उठता है। चहुँओर पक्षियों का मधुरिम कोलाहल सुनाई देने लगता है। तब मन में संवेदना, उदारता, सहिष्णुता, परदुःख कातरता का भाव तरंगायित हो उठता है। सृजनात्मक क्षमता को पंख लग जाते हैं। इन्हीं भावों का उद्दीपन आज प्रातःकाल से मेरे मन में भी हो रहा है, कारण है एक नन्ही चिड़िया के जोड़े का संताप!
27 मार्च 2019 रविवार का दिन दस बजे के आसपास मैं घर के बाहर खिड़की के पास बंधी डोरी पर कपड़े सुखाने को डाल रही थी। मैंने देखा कि वहीं एक नन्ही चिड़िया का जोड़ा बार-बार कपड़ों पर आकर बैठ जाता। कपड़े डालने के बाद मैं कुछ देर आराम करने के लिए उसी खिड़की से सटे अपने बैड पर आकर लेट गयी तब पतली सी लम्बी चोंच वाली गहरे नीले रंग की चिड़िया व भूरे रंग का चिड़ा अपनी अटखेलियों से मेरे मन को लुभाने लगे। कुछ देर बाद मैं घर के अन्य कामों में व्यस्त हो गई।
अगले दिन प्रातःकाल जब मैंने खिड़की पर देखा तो मुझे तिनकों का छोटा सा झाड़ डोरी पर लटका हुआ नजर आया। माया (मेरी कामवाली बाई) घर का काम कर रही थी। तब मैनें उससे कहा "माया देखो ये खिड़की के सामने कुछ लटक रहा है इसे निकालकर झाड़ कर फेंक दो" माया ने उसे तुरन्त नोचकर फेंक दिया। तब मैं लेशमात्र भी ये नहीं जानता थी कि इन नन्हें परिन्दों के नन्हें से मन में क्या चल रहा है। काम खत्म होने के बाद मैं तैयार होकर अपने कॉलेज चली गई। घर वापस आने पर मैंने देखा उसी स्थान पर फिर कुछ तिनके लटक रहे हैं, वही नन्ही चिड़िया का जोड़ा अपनी नन्ही-नन्ही चोंच में तिनके लाकर उसमें गूँथ रहे हैं। अब मेरी समझ में आ गया कि ये नन्हें प्राणी नए सृजन की तैयारी में जुटे हैं। अब मैं रोज अवसर मिलते ही बैड पर बैठकर उन दोनों पक्षियों की नीड़-निर्माण कला का अवलोकन करने लगी। वे दोनों एक-एक तिनका अपनी चोंच में संजोकर लाते और घोंसला में बड़ी कुशलता से पिरोते। मानों कोई कुशल शिल्पी बड़ी बारीकी, खूबसूरती और लगन से अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए भवन निर्माण कर रहा हो।
देखते ही देखते एक सप्ताह में उनका घोंसला बनकर तैयार हो गया। जिस प्रकार भवनों के खिड़की दरवाजों को बनाते समय धूप व वर्षा से बचाने के लिए उनके ऊपर झांप बना दी जाती है, ताकि घर के अन्दर तेज धूप या बारिश का पानी न आ सके। ठीक उसी प्रकार घोंसले का द्वार भी बड़े कलात्मक ढंग से छोटा सा बनाया गया जिसमें केवल वही दोनों चिड़ा-चिडिया प्रवेश कर सकें। उसके ऊपरी हिस्से पर कुछ झुकाव देते हुए गोलाई में तिनकों की छोटी सी झांप भी इस तरह बना दी गई थी, जिससे प्रवेश द्वार आधा ढका हुआ दिखाई दे रहा था तथा उसमें क्या है? ये भी किसी को न दिखाई दे। कुछ इसी प्रकार सुरक्षा की दृष्टि से घोंसले का निचला हिस्सा गहराई लेकर बनाया गया था ताकि उसमें रखे गए अण्डे या उनमें से निकले चूजे बड़े होने तक व उड़ने लायक होने तक सुरक्षित रह सकें। पता नहीं कब उस नन्हीं चिड़िया ने उस घोंसला में चार अण्डे दे दिए। वह दोनों रोज आकर उन अण्डों की देखभाल करते। फिर दाना-दुनका चुगने के लिए चले जाते। मैं व मेरे पडौसी शशांक मांडलिक का पूरा परिवार भी प्रतिदिन उस घोंसले का ध्यान रखकर नवजीवों (चिड़िया के बच्चों) के उत्पन्न होने का इन्तजार करने लगे। पर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। सृजन और विनाश प्रकृति का शाश्वत नियम जो लागू होना था।
7 अप्रैल 2019, दिन रविवार की सुबह आकाश में हल्के बादल छाए हुए थे, हवा में भी कुछ तीव्रता थी। माया रोज की तरह अपना काम निपटा रही थी। मैं रसोई में चाय बना रही थी कि तभी पडौसी का कुत्ता प्लूटो जोर-जोर से भौंककर उछलकूद करने लगा और चेन तोड़ने का प्रयास करने लगा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह भी उस बन्दर को कच्चा चबा डालना चाहता हो। आवाजें सुनकर हम सब बाहर निकले कुछ समझ पाते तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आततायी वानर सेना उस छोटे से घोंसले पर टूट चुकी थी। पलक झपकते ही एक शक्तिशाली बन्दर अपना शक्ति प्रदर्शन करते हुए उस घोंसले को झपटकर छत की मुंडेर पर ले गया। एक पल में चिड़िया की हफ्तों की मेहनत उस घोंसले को छिन्न-भिन्न कर तोड़-तोड़ कर नीचे फेंकने लगा और उसमें रखे चिड़िया के अण्डों को हमें दिखा-दिखा कर इस प्रकार खाने लगा मानों मुद्दतों बाद उसे स्वादिष्ट व्यंजन का स्वाद चखने को मिला हो।
ज्यों-ज्यों वह दुष्ट बन्दर उस घोंसले को निर्ममता पूर्वक नोच नोचकर नीचे फेंक रहा था त्यों-त्यों मेरा दिल भी टुकड़े-टुकड़े हुआ जा रहा था। हम सभी असहाय और असमंजस की स्थिति में बन्दर द्वारा किए जा रहे विनाश के इस तांडव को देख रहे थे। कुछ देर बाद वानर दल वहाँ से चला गया और छोड़ गया विनाश के निशान। अब मैं कल्पनाशीलता में डूबती उतरती चिन्तन करने लग गयी कि ये नन्हें परिन्दे इस गुजर गयी विपदा पर क्या प्रतिक्रिया करेंगे?
क्या गुजरेगी उन पर अपना आशियाना उजड़ जाने व अजन्मी संतानों को खोने का दर्द जानकर?
आख़िरकार कुछ देर बाद ही शुरू हो गया वो हृदयविदारक दृश्य!
वो नन्ही चिड़िया उड़ती हुई आयी रस्सी पर बने अपने घोंसला को न पाकर व्याकुल होकर इधर-उधर देखने लगी। घबरायी सी वह उड़-उड़कर चारों तरफ घोंसला ढूंढने लगी। अचानक उसकी नजर छितरे, बिखरे पडे़ घोंसले पर पडी़, अब वह अपनी चोंच से उन घोंसले के टुकड़ों को उठाती उन्हें जोर जोर से झटककर अपने अण्डों को ढूंढती न मिलने पर पुनः डोरी पर बैठ जाती, डोरी को चोंच से नोचती और फिर टूटे पड़े घोंसले पर मंडराने लगती। कई चक्कर काटने के बाद अब उसे सब कुछ खोने का सच्चा अहसास हो गया। वह उसी जगह जहाँ घोंसला बनाया था। डोरी पर बैठकर कभी उल्टा लटककर हृदय को चीर देने वाला करूण रूदन करने लगी। चोंच को ऊपर उठाती आकाश की ओर देखकर चीत्कार करती, मानों ऊपर बैठे उस विधाता से सवाल कर रही हो कि मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया? क्यूँ मेरा घर खुशियां आने से पहले ही उजाड़ दिया? तभी उसकी हृदयविदारक चीत्कार सुनकर उसका साथी चिड़ा भी कहीं से उड़ता हुआ आ पहुंचा, वह भी घबराया सा कभी चिड़िया के पास जाता तो कभी घोंसले के टुकडों पर मंडराकर अपना दुख प्रकट करता। एक अच्छे साथी की तरह वह अपनी चोंच से चिड़िया को सहलाकर उसे ढांढस बंधाने लग जाता। दोनों एक साथ उड़कर बार-बार घोंसले पर मंडराते फिर डोरी पर बैठकर विलाप करने लगते।
उस समय मुझे उन परिन्दों में मानव जैसी संवेदनाएं नजर आने लगीं। जिस प्रकार एक पुरूष विपत्तिकाल में अपनी सहनशीलता, गंभीरता और साहस का परिचय देते हुए बिना आँसू बहाए अपने हृदय पर पत्थर रखकर बडे़ से बड़ा दुःख सह जाता है तथा घर के सभी सदस्यों को ढांढस बंधाकर संभालता है, महिला पुरूष के कन्धे का सहारा लेकर रोती है।अपना दुःख अपने रूदन से प्रकट कर अपना मन हल्का कर लेती है पर पुरूष परिवार और दुखी न हो अपने आँसू पी जाता है। पर अन्दर ही अन्दर घुटता है। ठीक यही हाल इस समय चिड़े का भी था। मैं उसके दर्द का अहसास कर रही थी।
इन नन्हें परिन्दों की व्यथा और संताप देखते-देखते दिन का एक पहर गुजर चुका था। 12 बज गए थे, मेरा हृदय भी उन परिन्दों के दुःख में विदीर्ण हो रहा था क्योंकि उनके आशियाना बनाने से लेकर उजड़ने तक का मंज़र मेरी आँखों के सामने से गुजरा था। मैंने अभी तक स्नान भी नहीं किया था अनमने मन से उठकर मैं नहाने चली गयी। नहाकर कुछ हल्कापन महसूस हुआ और खाना बनाने लगी, पर सारा घटनाक्रम अब भी मेरी आँखों के सामने चलचित्र की भांति घूम रहा था। पर दुःख कातरता का भाव मेरे मन में तरंगायित हो उठा। खाना बनाकर मैं अपने हाथ में लेखन सामग्री लेकर फिर उसी स्थान पर बैठ गयी और बाहर के उस दर्दभरे नजारे को जिसे मैं अपने मोबाइल के कैमरे में भी कुछ क्षणों को कैद कर चुकी थी, अपनी कलम से शब्दों में पिरोकर का़गज पर उकेरने लगी। इन नन्हें पंछियों की पीड़ा, इनका संताप जो सृजन से अब विनाश में परिवर्तित हो चुका था। मैं एक सच्ची कहानी के रूप में सृजित करने लगी जो कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। यह "नियति का खेल" (नन्ही चिड़िया का संताप) हर वसन्त में संस्मरण के रूप में बहुत याद आएगा।
