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Vijay Erry

Inspirational Others

4  

Vijay Erry

Inspirational Others

तुम बिन

तुम बिन

4 mins
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हिन्दी कहानी: तुम बिन

(लगभग 1500 शब्दों में)  


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प्रस्तावना

कभी-कभी ज़िन्दगी हमें ऐसे मोड़ पर खड़ा कर देती है जहाँ हर सांस भारी लगती है। किसी अपने का जाना केवल उसकी अनुपस्थिति नहीं होता, बल्कि हमारे भीतर की दुनिया का टूट जाना होता है। यह कहानी राघव और सिया की है—प्रेम, विरह और आत्म-खोज की।  


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पहला अध्याय: मुलाक़ात

राघव और सिया की पहली मुलाक़ात कॉलेज के पुस्तकालय में हुई थी। राघव किताबों में डूबा रहता था, जबकि सिया को कविताएँ और कहानियाँ पढ़ने का शौक था।  

एक दिन सिया ने मुस्कुराते हुए कहा—  

“तुम हमेशा इतने गंभीर क्यों रहते हो? ज़िन्दगी सिर्फ़ किताबों में नहीं, हंसी में भी मिलती है।”  


राघव ने पहली बार किसी की मुस्कान में सुकून पाया। धीरे-धीरे दोनों दोस्त बने, फिर दोस्ती प्रेम में बदल गई।  


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दूसरा अध्याय: प्रेम और जीवन

शादी के बाद दोनों की ज़िन्दगी खुशियों से भर गई। सिया को पौधे लगाना पसंद था। उसने घर के आँगन को छोटे-से बगीचे में बदल दिया। राघव जब ऑफिस से लौटता, तो सिया उसकी थकान को अपनी बातों से मिटा देती।  


राघव अक्सर कहता—  

“सिया, तुम्हारे बिना यह घर सिर्फ़ दीवारें हैं। तुम हो तो यह घर एक संसार है।”  


सिया हंसकर जवाब देती—  

“तो वादा करो, चाहे कुछ भी हो, तुम मुझे कभी अकेला महसूस नहीं कराओगे।”  


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तीसरा अध्याय: बीमारी

लेकिन ज़िन्दगी हमेशा सपनों जैसी नहीं होती। एक दिन सिया को तेज़ बुखार और थकान रहने लगी। जाँच कराने पर पता चला कि उसे कैंसर है।  


राघव की दुनिया जैसे थम गई। उसने डॉक्टरों से कहा—  

“जो भी इलाज हो, जो भी खर्चा हो, मैं करूँगा। बस मेरी सिया ठीक हो जाए।”  


इलाज शुरू हुआ। अस्पताल की सफ़ेद दीवारें, दवाइयों की गंध और मशीनों की आवाज़ें राघव के दिल को चीरती थीं। सिया दर्द में भी मुस्कुराती और कहती—  

“राघव, डरना मत। अगर मैं हार भी गई, तो मेरी यादें तुम्हारे साथ रहेंगी।”  


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चौथा अध्याय: विरह

कुछ महीनों बाद सिया ने आख़िरी सांस ली। राघव का हाथ थामे उसने कहा—  

“तुम बिन जीना मुश्किल होगा, लेकिन तुम जीना सीख लेना।”  


राघव की आँखों से आँसू बहते रहे। उसके बाद घर का हर कोना सन्नाटे से भर गया।  

- बगीचे के पौधे मुरझाने लगे।  

- अलमारी में रखी सिया की किताबें धूल से ढक गईं।  

- दीवारों पर टंगी तस्वीरें उसे हर पल चुभतीं।  


रातें सबसे कठिन थीं। बिस्तर पर लेटते ही उसे सिया की आवाज़ सुनाई देती—“राघव, आज का दिन कैसा रहा?” लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं था।  


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पाँचवाँ अध्याय: आत्म-खोज

एक दिन राघव ने सिया की डायरी खोली। उसमें लिखा था—  

"राघव, अगर मैं कभी तुम्हारे साथ न रहूँ, तो मेरी यादों को बोझ मत बनाना। उन्हें ताक़त बनाना।"  


यह पढ़कर राघव की आँखें भर आईं। लेकिन उसी पल उसे लगा कि सिया चाहती थी कि वह जीए।  


उसने तय किया कि वह सिया के अधूरे सपने पूरे करेगा। सिया बच्चों को पढ़ाना चाहती थी। राघव ने पास के स्कूल में जाकर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।  


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छठा अध्याय: नया सफ़र

बच्चों की मासूमियत ने उसके दिल का दर्द धीरे-धीरे कम किया।  

- जब कोई बच्चा मुस्कुराता, तो उसे सिया की मुस्कान याद आती।  

- जब कोई बच्चा सवाल पूछता, तो उसे सिया की जिज्ञासा याद आती।  


धीरे-धीरे राघव ने महसूस किया कि सिया की आत्मा उसके साथ है। वह हर बच्चे की आँखों में, हर मुस्कान में, हर मासूमियत में उसे देखता।  


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सातवाँ अध्याय: संवाद और स्मृतियाँ

एक शाम राघव बगीचे में बैठा था। उसने सिया के पौधों को फिर से पानी देना शुरू किया। हवा में हल्की खुशबू थी।  

राघव ने आसमान की ओर देखा और कहा—  

“सिया, तुम बिन जीना मुश्किल है। लेकिन तुम्हारी यादों ने मुझे जीना सिखा दिया।”  


उस पल उसे लगा जैसे हवा में सिया की हंसी गूँज रही हो।  


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आठवाँ अध्याय: अंत और सीख

सालों बाद भी राघव सिया को भूल नहीं पाया। लेकिन उसने जीना सीख लिया।  

अब वह जानता था कि सिया उसके साथ नहीं है, पर उसकी प्रेरणा हमेशा उसके साथ है।  


राघव बच्चों को पढ़ाते हुए अक्सर कहता—  

“ज़िन्दगी में अगर कोई अपना चला जाए, तो उसकी यादों को ताक़त बनाओ। क्योंकि प्रेम कभी मरता नहीं, वह सिर्फ़ रूप बदलता है।”  


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निष्कर्ष

यह कहानी सिर्फ़ राघव और सिया की नहीं, बल्कि उन सबकी है जिन्होंने किसी अपने को खोया है।  

“तुम बिन” का दर्द गहरा है, लेकिन यादों से जीना सीखना ही असली जीवन है।  


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