Apoorva Anitya

Tragedy


4.5  

Apoorva Anitya

Tragedy


ठंडा धुआं

ठंडा धुआं

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सुदीप लगातार खिड़की से बाहर देखे जा रहा था, मौसम भी कैसा हो रहा है,ठंडा और उदास सब कुछ धीमा सा। "या शायद मेरा मन ही थक चुका है", उसने सोचा। "ये चारु कैसी हो गई है! कुछ दिन पहले तक कैसे चहकती रहती थी, कहां गई इसकी आवाज़ की खनक?"

"सुन रहे हो न तुम मेरी बात?" चारु का स्वर भी थका हुए था।

"और क्या सुनना है अब?" धीमी आवाज़ में उसने जवाब दिया।

"मैंने पूरी कोशिश की, अपनी बात समझाने की,उन्हें मनाने की।"

 "हम्म, फिर?" अनमना सा सुदीप उससे नज़रें चुरा रहा था।

"फिर क्या, और मैं कर भी क्या सकती थी, तुम तो जानते ही हो सब कुछ, वे नहीं माने, किसी भी तरह।" चारु सफाई देना चाह रही थी।

"हां तो क्या हुआ, हम दोनों को तो पहले ही पता था न, ऐसा ही कुछ होगा। कोई बात नहीं, तुम अपने मन में कोई मलाल न रखो, मैं ठीक हूं।" सुदीप के गले में जैसे कुछ अटक सा गया।"अच्छा अभी चलता हूं, कोई बात हो तो कॉल कर लेना, बाय!"

"बाय, बाय.... सु.. कुछ नहीं तुम ठीक से रहना, मैं कॉल करूंगी!" चारु अब तक अपने को बांध कर रखे हुए थी, कि रो न पड़े। 

नहीं सुदीप को कुछ नहीं पता था, उसे सिर्फ़ इतना पता था कि वे कभी अलग नहीं होंगे! लेकिन अब हो रहे थे, लेकिन क्यूं? ये भी उसे नहीं पता है। या वो पता करना ही नहीं चाहता है।

चारु को विदा कर सुदीप बाहर सड़क पर आ गया। दोपहर के तीन बज रहे थे, फिर भी हवा में ज़रा सी भी गर्मी नहीं थी। सूरज भी उसके मन की तरह बुझा हुआ है।

चारु की शादी तय हो चुकी है, पिता के सामने कुछ कह न पाई अपनी इच्छा- अनिच्छा, लेकिन अब जब सब कुछ तय हो चुका है तो मन मारकर ही सही, तैयारियों में व्यस्त है।

दूसरी ओर सुदीप अचानक ही जैसे रीत सा गया है, कहीं भी चित्त नहीं लगता।  

व्यवहार में जबकि कोई खास बदलाव नहीं देखने में आया, सबसे वैसे ही मिलता है, बातचीत करता है और हंसता मुस्कुराता भी है मौका पड़े तो, फिर भी जैसे सब खाली है, अधूरा है।

"एक रोटी और खा ले बेटा, तेरी पसंद की सब्ज़ी बनी है न आज तो!" मां कुछ दिन से देख रही थी, सुदीप को खाने से अरुचि हो गई है।

"नहीं मां, बस हो गया मेरा। मौसम बदल रहा है इसलिए शायद भूख नहीं लगती।" मरी सी आवाज़ में सुदीप ने झूठ बोला। 

मार्च का महीना है, मौसम में और बरसों के मुकाबले अधिक ही ठंडक है, ऐसा तो कोई खराब मौसम नहीं है कि आदमी की भूख मर जाए। बेटे को देख कर मां ने सोचा, कैसा सूखा सा मुंह लिए फिरता है आजकल, न जाने क्या हुआ है इसे।" हे प्रभु, रक्षा करना।"

खाने को देखकर ही सुदीप के पेट में मरोड़ उठने लगती है। अनिच्छा से ही कुछ खा लेता है बस, मां का दिल रखने के लिए। 

कहीं आने - जाने का भी मन नहीं करता। दिन भर अपने कमरे में पड़ा छत को ताका करता है, अदृश्य लकीरों में तारीखों की गिनती जैसी गिनता है, आज है दस मार्च, आज से पैंतीस दिन और। अब बस गिनती ही करते रहना है।

"और जब ये गिनती ख़तम हो जाएगी तब? समय अनंत हो सकता है! ये हिस्सा अनंत हो जाता तो? कितना अच्छा होता, मैं अपना जीवन ये पैंतीस दिन गिनने में ही गुज़ार देता। " सुदीप ने सर झटका और ये विचार भी फेंक दिए। करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगा।

समय लेकिन नहीं सोया, न रुका, गिनती खत्म हो गई।


विदा के बाद चारु पहली बार आई है, मायके। सड़कें तप रहीं हैं, रास्तों पे गर्म धूल के गुबार हैं, सब खुश्क है, सूखा, गरम, जलता हुआ। खिड़की से बाहर झांका तो सामने से सुदीप आता हुआ दिखाई दिया , नज़रें मिलीं तो एक पल को वातावरण नम हो गया...चारु की आंखे जैसे जल उठीं! सुदीप ने ठंडी निगाहों से उसकी ओर जैसे नहीं देखा, और कतरा के निकल गया। चारु का दिल बैठ गया, गला भर आया। कौन था ये? उसके प्रेमी का प्रेत?उसका सुदीप तो ऐसा नहीं दिखता था। ऐसा व्यवहार नहीं करता था।

 वो जो उसका नाम भर सुन के खिल जाता था, ऐसे अजनबी जैसे सामने से निकल गया। नज़र भर के देखा तक नहीं? "हां, तो अब क्यूं देखता चारु, कौन है तू उसकी? तेरा प्रेम बीत गया। अब ये प्रेत बचा है, इस पर चाहे तरस खा, चाहे रो के अपना जी हल्का कर ले। अब वो जो तेरा था, तू जिसकी थी, वो नहीं रहा।" चारु ने खुद से कहा, गले में जैसे पत्थर अटक गया। आह निकली, दर्द के साथ थूक निगला और जलते हुए चार आंसू जल्दी जल्दी पोंछ लिए।बारिश अच्छी हो रही है इस साल, कॉलेज से आते वक़्त रोज़ ही सुदीप भीग जाता है। जान कर या अनजाने?

खोया हुआ वह अब भी है कहीं, कोई न ढूंढ पाया अब तक, कि वह किन रास्तों पे भटक रहा है। बातचीत, व्यवहार में सामान्य से कहीं अधिक ठंडापन आ गया है। छात्रों को डांटना - डपटना, झिड़कना भी जैसे भूल गया है। एक दिन एक छात्र कोई प्रश्न ले कर आया , महाशय उत्तर देने के स्थान पर उसका मुंह ताकने लगे, और ताकते रहे जब तक लड़का झेंप न गया और "सॉरी सर", कह कर वापस चला गया। 

सुदीप के लिए वक़्त अब सच में ही रुक गया है जैसे, कटता ही नहीं। सब जैसे शून्य है, और वो इस शून्य में भटक रहा है। कुछ समझ नहीं आता, कुछ याद नहीं रहता।

कीचड़ में पैर फंस गया, एक तो मां के मना करने के बावजूद चप्पल पहन के निकल पड़ा उपर से रास्ते पे देखने के बजाय आसमान में न जाने क्या खोज रहा था? पैर धंस गया, शरीर का संतुलन बिगड़ा तो गिरते गिरते बचा। अब कीचड़ में से पैर सुलझाने की बजाय खड़े होके ताक रहा है, कुछ पल बाद चप्पल वैसी की वैसी फंसी छोड़ के नंगे पैर आगे बढ़ गया।

दोस्तों ने भी मिलना जुलना अब कम कर दिया है, कोई कहां तक इस गूंगे गुड्डे को साथ ले कर घूमे। कोई बात बोलो हूं, अच्छी बुरी, हूं! बात बात पे सही - गलत की बहस करने वाला सुदीप अब हर बात पे राज़ी है। वह जान बूझ के ऐसा नहीं कर रहा, दिमाग़ की पगडंडियां आपस में इस कदर उलझ चुकी हैं कि किसी मंजिल पे पहुंचने ही नहीं देती। जितना शीतल, शांत, संयमित बाहर से दिखाई देता है, इतना वह कभी न था।


लगभग डेढ़ साल बीत चुका है, चारु के विवाह को। वह मां बनने वाली है। नई ज़िंदगी, नई खुशियां ले कर आ रही है। सुदीप को पता चला, मुस्कुरा के रह गया.. उफ़। कुछ और बर्फ़ सी जम गई कहीं और ज़िन्दगी उस बर्फ़ के नीचे और ज़्यादा गहरी धंसती जा रही है।

मां ने ज़ोर देकर उससे शादी के लिए हामी भरवा ली है। मां अब कुछ आश्वस्त है, व्यस्त है।

और वह कुछ और भी कहीं भूल गया है।


"सुदीप, सुदीप कहां है भाई! नीचे आ तो जल्दी!" माणिक घबरा के ज़ोर से चीख जैसे रहा था।

"क्या है यार, आसमान टूट पड़ा क्या?" सुदीप ने होंठ टेढ़े कर खीझते हुए पूछा।

"भाई, तुझे पता है क्या?" माणिक की आवाज़ में घबराहट थी।

"नहीं, मुझे कुछ भी नहीं पता। बताएगा तो बता दे, वरना आ तुझे चाय बना के पिलाता हूं। मां घर पे नहीं हैं।" उसका स्वर वैसा ही हिम शीतल था।

"चारु भा.. चारु चल बसी,यहीं! सिटी हॉस्पिटल में,सुना बच्चा होने वाला था!" स्वर कांप रहा था माणिक का।

एक पल के लिए सुदीप को लगा जैसे आंखों में अचानक धुआं भर गया है। उसने जल्दी - जल्दी दो तीन बार पलकें झपकाईं और एक गहरी सांस ले कर धुएं की घुटन को बाहर छोड़ दिया।

"अच्छा!!! .......हूं! चल अब आ जा बैठ, मैं चाय बना के ले आता हूं। तू टीवी ऑन करले जब तक!" ठंडी आवाज़ में सुदीप ने कहा, और रसोई की ओर चल पड़ा।


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