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अमिता मिश्रा 'निःशब्द'

Comedy Drama Classics

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अमिता मिश्रा 'निःशब्द'

Comedy Drama Classics

त्रियाचरित जानै नहिं कोई

त्रियाचरित जानै नहिं कोई

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यह कहानी एक लोककथा है। जैसी कि पहले के समय में लोग मनोरंजन हेतु जाड़े के दिनों में अलाव तापते हुए सुनते-सुनाते थे।

किसी समय एक गाँव में एक किसान दंपति रहते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, पर दोनों में अगाध प्रेम था। पति स्वभाव से बहुत सीधा और भोला था, जबकि पत्नी अत्यंत समझदार और बु‌द्धिमती थी। दोनों के दिन बड़े प्रेम और हँसी-खुशी से कट रहे थे।

एक दिन पति ने गाँव में किसी मित्र से एक शब्द सुना 'त्रियाचरित्र'। उसके लिए यह नया शब्द था। जब उसने इसका अर्थ पूछा, तो मित्र उसका मज़ाक उड़ाने लगे। वह थोड़ा निराश और शर्मिदा सा घर लौट आया। घर पर पत्नी ने रोज़ की भाँति उसकी पसंद का भोजन बड़े प्रेम से परोसा, किंतु वह अनमना सा खाने बैठा। पत्नी तुरंत ताड़ गई कि कुछ गड़बड़ है। वह बोली, "क्या हुआ? खाना अच्छा नहीं बना क्या? या कुछ और बात है... यह मुँह क्यों लटका रखा है?"

पहले तो पति ने टालमटोल की, लेकिन पत्नी अडिग रही, "मैं तुम्हें जानती हूँ, कुछ तो बात है।" आखिर पति ने बता ही दिया। मन ही मन पत्नी को अपने भोले पति पर हँसी आई, पर वह चुप रही। पति ने पूछा, "क्या तू जानती है कि 'त्रियाचरित्र' क्या होता है?" पत्नी बोली. "हाँ, जानती हूँ।" पति खुश होकर बोला, "फिर तू ही मुझे समझा दे।" पत्नी ने ठिठोली करते हुए कहा, "कहकर सुना दूँ या करके दिखा दूँ?"

बेचारा भोला पति बोला, "कहकर सुनाएगी तो शायद कम समझ पाऊँगा। तू करके दिखा सकती है तो करके ही दिखा, ताकि अच्छे से समझ लूँ।" पत्नी बोली, "अच्छा, किसी दिन दिखा दूँगी। अब आराम करो, मैं भी खा-पीकर दूसरे काम निपटा लूँ।" पति ने ज़िद की, "अब तू लगी नखरे करने! अभी क्यों नहीं दिखाती?" पत्नी ने हँसकर कहा, "अरे, यह कोई नाच थोड़ी है जो अभी नाचकर दिखा दूँ! 'त्रियाचरित्र' है. सब्र करो। वादा करती हूँ, जरूर दिखा दूँगी।"

पति को विश्वास था कि उसकी पत्नी कभी झूठ नहीं बोलती. इसलिए वह मान गया। एक-दो दिन बीत गए और पति अपने खेतों और बैलों के काम में वह बात भूल भी गया। अगले दिन पति को बताकर पत्नी हाट-बाज़ार गई। वहाँ से घरेलू सामान के साथ वह एक बढ़िया सी मछली भी ले आई और उसे पति से छिपाकर रख दिया। रात को बातों-बातों में उसने जान लिया कि कल पति कौन सा खेत जोतने वाला है। जब पति सो गया, तो वह चुपके से उसी खेत में गई और मिट्टी खोदकर मछली दबा आई।

अगले दिन सुबह सब सामान्य था। किसान हल-बैल लेकर खेत चला गया और पत्नी अपनी गृहस्थी सँभालने में लग गई। उधर खेत जोतते समय जब हल मछली के पास पहुँचा, तो मिट्टी के साथ मछली भी बाहर उभर आई। किसान चौंक गया, "यह क्या है?" लेकिन जैसे ही उसने मछली हाथ में उठाई, वह खुशी से झूम उठा, क्योंकि उसे मछली खाना बहुत प्रिय था। वह हल-बैल वहीं छोड़कर खुशी-खुशी घर की ओर भागा और ज़ोर से पत्नी को आवाज़ लगाई, "अरी सुनती हो! देखो, मैं क्या लाया हूँ!"

पत्नी तो आवाज सुनकर ही सब समझ गई, लेकिन बनावटी झुंझलाहट दिखाते हुए बोली, "ऐसा क्या लाल मिल गया जो कूदते हुए घर आ गए? अभी तो मैंने खाना भी नहीं बनाया है।"

किसान बोला, "खाना अब बना लेना, देख मुझे खेत में मछली मिली है। आज यही बनाना, जब लौदूँगा तो दोनों साथ बैठकर खाएंगे।"

पत्नी भी दिखाने के लिए खुश होते हुए बोली, "हाँ-हाँ, बना दूँगी। पहले जाकर खेत देखो, बैलों को यों ही खड़ा कर आए हो, कहीं भाग गए तो ढूँढ़ते फिरोगे। ज़रा सी मछली क्या मिल गई, पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे!"

किसान ने कहा, "क्यों न खुश होऊँ? बड़े दिनों बाद मछली खाऊँगा। कल तू हाट गई थी पर तुझसे यह भी न हुआ कि मेरे लिए मछली ले आती। अब जाता हूँ बैलों के पास, तू मछली खूब अच्छे से बनाना।" कहकर किसान चला गया और पत्नी मछली पकाने रसोई में चली गई।

मछली पकाने के बाद उसने पूरी पकी पकाई मछली छिपाकर रख दी और रसोई को ऐसा झाड़-पोंछकर साफ किया कि मछली की गंध तक न रहे। अलबत्ता, उसने मछली के दो टुकड़े अपने कपड़ों में छिपा लिए। दोपहर में किसान मछली खाने की कल्पना करता हुआ खुशी-खुशी लौटा और नहा-धोकर खाने बैठा। पत्नी ने रोज़ की तरह सादा खाना परोसा, पर मछली नदारद थी।

किसान बोला, "यह क्या? तूने मछली तो दी ही नहीं! बावरी, भूल गई क्या?"

पत्नी ने हैरानी से आँखें फैलाई, "मछली? कौन सी मछली?"

किसान बोला, "देख ठिठोली मत कर, बड़ी भूख लगी है। जल्दी से मछली परोस दे।"

पत्नी ने झुंझलाकर कहा, "क्या मछली मछली लगा रखी है? कहाँ से आई मछली जो बना दूँ?"

किसान चिल्लाया, "कहाँ से आई? अरे, मैं ही तो सुबह खेत से लाया था!"

पत्नी बोली, "बावरे हो गए हो क्या? भला खेत में मछली कहाँ से मिलेगी जो तुम मुझे दे गए थे?"

किसान का पारा चढ़ गया, "देख मैं मार दूँगा! तू जरूर सारी अकेले खाना चाहती है। पहले तो तूने ऐसा कभी नहीं किया, आज क्या हो गया?"

पत्नी बोली, "फिर वही बात! भला खेत में मछली होती है? जरूर तुम्हें धूप लग गई है जो दिमाग फिर गया है।"

अब किसान आपे से बाहर हो गया और पत्नी को मारने झपटा। पत्नी घर के बाहर भागी और शोर मचाने लगी, "हाय देखो! मेरे पति को कुछ हो गया है, अनाप-शनाप बोल रहे हैं और मुझे मारना चाहते हैं। मैं तो बर्बाद हो गई!" गाँव वाले जुट गए। किसान गुस्से में उसे मारने दौड़ा, तो लोगों ने उसे पकड़ लिया।

किसान कहता, "मैं खेत से मछली लाया था," और पत्नी कहती, "भला खेत में मछली कब से उगने लगी?" गाँव वालों को पत्नी की बात सही लगी और किसान पागल लगने लगा। उन्होंने किसान को खंभे से बाँध दिया। पत्नी सुबकती रही। जब लोग अपने घरों को लौटने लगे, तो पत्नी ने चुपके से साड़ी में छिपे मछली के टुकड़े निकाले और पति को दिखाकर खाने लगी।

किसान चिल्लाया, "देखो देखो! मुझे दिखाकर मछली खा रही है!" लोग मुड़े, तो पत्नी के हाथ में कुछ न था और वह फिर से रोने लगी, "इन्हें हर जगह मछली ही दिख रही है, हाय मेरा क्या होगा!" लोग झुंझलाकर चले गए। पत्नी ने फिर वही किया। थक-हारकर किसान रुआँसा हो गया और बोला, "तू मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही है? मैं तो तुझे कितना भला समझता था।"

पति को रोता देख पत्नी का दिल पिघल गया। उसने रस्सी खोल दी और आँसू पोंछते हुए बोली, "तुम्हें ही तो 'त्रियाचरित्र' देखना था!"

किसान चौंका, "हैं! तो यह त्रियाचरित्र था?"

पत्नी हँसी, "हाँ भोले बलम! जो है उसे 'नहीं' और जो नहीं है उसे 'है' सिद्ध कर देना ही त्रियाचरित्र है। अब समझे?"

किसान सिर पकड़कर बैठ गया और बोला, "हाँ मेरी माँ, समझ गया! अब कसम खा ले कि फिर कभी मुझे त्रियाचरित्र नहीं दिखाएगी।"

दोनों हँसने लगे और फिर खुशी-खुशी रहने लगे।

नोट- दोस्तों! कहानी कैसी लगी कमेंट में बताना न भूलें...!
धन्यवाद...🙏



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