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अमिता मिश्रा 'निःशब्द'

Drama Classics Fantasy

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अमिता मिश्रा 'निःशब्द'

Drama Classics Fantasy

राजकुमारी सुवर्णा - एक रोचक दास्तान

राजकुमारी सुवर्णा - एक रोचक दास्तान

10 mins
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"नमस्कार दोस्तों!

यह एक पुराने ज़माने की काल्पनिक लोककथा है, वैसी ही जैसी हमारी दादी-नानी अक्सर हमें रातों को कहानियों की जादुई दुनिया में ले जाने के लिए सुनाया करती थीं। मैंने यह कहानी अपनी एक नानी से सुनी थी। वे बड़े चाव से इसे 'राजा विक्रमादित्य की कहानी' कहकर सुनाया करती थीं... पर रुकिए! ये वे विक्रमादित्य नहीं हैं जिनके नाम पर 'विक्रमी संवत' चला या जिन पर मशहूर 'बैताल-पचीसी' लिखी गई है।

बल्कि, यह तो लोक-कथाओं के संसार के एक अलग विक्रमादित्य की कहानी है। हमारी यह कहानी अपने पात्रों एवं घटनाओं के माध्यम से विभिन्न दिलचस्प और अनूठे मोड़ों से गुज़रती हुई, हमें एक ऐसे निराले वातावरण की सैर कराती है जहाँ कल्पना और संवेदना का सुंदर संगम है। जिस सादगी और रस के साथ मैंने इसे सुना था, उसी भाव से इसे आपके लिए शब्दों में पिरोने की कोशिश की है। मुझे पूरा यकीन है कि यह कहानी आपके दिल को भी ज़रूर छुएगी।

स्पष्टीकरण: यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसका उद्देश्य किसी ऐतिहासिक या साहित्यिक तथ्य को पेश करना नहीं, बल्कि लोक-रंजन और मनोरंजन है। मुझे उम्मीद है कि यह कहानी आपको एक सुखद अनुभव देगी।"

<★★★★★>

किसी समय, ऋषियों की तपोस्थली माने जाने वाले एक शांत और सघन वन में, एक विशाल वृक्ष पर गौरैया का एक जोड़ा रहता था। दोनों पक्षियों में बहुत प्रेम था। दोनों के कई बच्चे हुए, जो बड़े होकर उड़ चुके थे। आजकल वे दोनों ही घोंसले में रहते थे और आपस में सुख-दुख बाँटते थे।

सर्दियों की एक सर्द शाम, जब सभी परिंदे दाना चुगकर अपने घोंसलों में लौट आए थे, वे दोनों भी दिनभर घूम-फिरकर और भरपेट चारा चुगकर हँसते-खेलते अपने घोंसले में लौट आए थे। अभी वे घोंसले में आकर आराम से बैठे ही थे कि उन्हें हल्की-हल्की किसी के बोलने की आवाज़ सुनाई दी।

पक्षियों ने घोंसले से बाहर झाँककर पेड़ के नीचे देखा, तो पेड़ की जड़ों के पास एक पथिक मनुष्य बैठा दिखा, जो ठंड से काँप रहा था। उसे देखकर लग रहा था कि वह अपनी लंबी यात्रा से थक गया है। थकान एवं ठंड ने उसे लगभग निढाल कर दिया था।

पेड़ के नीचे बैठा वह पथिक, अकेला बैठा मानो अपने आप से ही बातें कर रहा था....

"ओह! कैसी बुरी ठंड है... शाम ढल रही है और अब मैं थक गया हूँ, मुझसे अब और नहीं चला जाएगा। लगता है आज की रात यहीं इसी घने वन में गुज़ारनी पड़ेगी। आज की रात बिताने और शरण के लिए यह पेड़ अच्छा रहेगा।" (उसने ऊपर पेड़ की सघनता को देखते हुए कहा) "यह पेड़ बहुत घना है, इसलिए मुझे भरोसा है कि सर्द रात्रि की शीत से यह अवश्य मेरी रक्षा करेगा।"

फिर थोड़ी देर रुककर वह मनुष्य पुनः अपने आप से बातें करने लगा…

"काश! कहीं से कुछ आग की व्यवस्था हो जाती, तो ठंड से थोड़ी और राहत मिलती। बिना आग के इस भयानक जंगल में सर्दी की रात काटनी अत्यधिक दुखदायी होगी। मेरे पास आग जलाने की कोई व्यवस्था नहीं है, न जाने रात कैसे कटेगी। उफ़! यह ठंड। काश! इस वक्त कहीं से अलाव की व्यवस्था हो सकती।"

पथिक काँपते हुए अपने हाथों से अपना शरीर ढंकने और गर्म रखने का प्रयास सा करता हुआ इधर-उधर देख रहा था। उसके दाँत बजने की आवाज़ उन परिंदों को भी सुनाई दे रही थी, साथ ही उसकी कँपकँपाती आवाज़ बता रही थी कि वह सचमुच ठंड से बुरी तरह पीड़ित है।

पथिक की बड़बड़ाहट सुनकर गौरैया ने अपने गौरे से कहा...

"ज़रा देखो तो, पेड़ के नीचे बैठा यह दीन मनुष्य ठंड से कैसे काँप रहा है… मुझे इस पर बड़ी दया आ रही है, काश हम इसकी कुछ सहायता कर सकते।"

गौरा बोला... "प्रिये, तुम सही कह रही हो। इसे इस तरह ठंड से काँपते देखकर मुझे भी इस पर दया आ रही है... चूंकि यह पथिक हमारे पेड़ के नीचे ठहरा है, इसलिए यह आज रात्रि हमारा अतिथि है, और इसलिए हमें इसकी सहायता करनी चाहिए… मैंने कभी इसी वन में निवास करने वाले एक ऋषि के मुख से सुना था कि—‘गृहस्थ को अपने द्वार पर आए अतिथि का सत्कार करना चाहिए, अगर गृहस्थ ऐसा नहीं करता तो उसके पुण्यों की हानि होती है’... अतः हमें कैसे भी करके इसकी सहायता करनी चाहिए। यही हमारा कर्तव्य है।"

गौरैया बोली... "प्रिय, तुम ठीक कह रहे हो और मेरी भी यही इच्छा है, किंतु हम नन्हे-नन्हे पक्षी भला इसकी क्या ही सहायता कर सकते हैं?"

गौरा कुछ सोचकर बोला... "मेरे पास एक उपाय है... तुम आसपास से कुछ लकड़ियाँ इकट्ठी कर लो, तब तक मैं पास ही स्थित ऋषियों के आश्रम से जलती हुई लकड़ी लाने का प्रयत्न करता हूँ।"

यह कहकर गौरा तत्काल घोंसले से निकला और उड़ गया।

गौरे के उड़ने के बाद गौरैया भी घोंसले से निकली और आसपास से लकड़ियाँ चुनकर उस पथिक के आगे गिराने लगी। वह पथिक कुछ देर कौतूहल से गौरैया का यह विचित्र कार्य देखता रहा, फिर विस्मय से बुदबुदाया— "यह नन्ही गौरैया क्या कर रही है? क्या यह सचमुच मेरी सहायता का प्रयास कर रही है? शायद ईश्वर ने ही इसे मेरी मदद के लिए भेजा है।" यह सोचकर उसके भीतर भी उत्साह जागा और उसने भी लकड़ियाँ इकट्ठी करनी शुरू कर दीं। गौरैया तो छोटी लकड़ियाँ ही ला रही थी, लेकिन वह बड़ी लकड़ियाँ भी इकट्ठी कर लाया। और थोड़ी ही देर में उसके पास काफी लकड़ियाँ इकट्ठी हो गईं, जिन्हें समेटकर उसने अलाव का रूप दे दिया।

अब वह अलाव जलाने का उपाय सोच ही रहा था कि तभी गौरा लौट आया। उसकी चोंच में एक जलती लकड़ी दबी थी, जिसे उसने उन दोनों के इकट्ठे किए गए लकड़ियों के ढेर पर गिरा दिया। यह अद्भुत दृश्य देखकर वह मनुष्य प्रसन्न हो उठा और उसने जल्दी-जल्दी उन लकड़ियों को ठीक से रखकर प्रयत्नपूर्वक आग जला ली। थोड़ी ही देर में उसे हाड़ कँपाती सर्दी से राहत मिल गई।

अपनी मेहनत सफल होती देख पेड़ की टहनी पर बैठे परिंदों के जोड़े ने खुश होकर एक-दूसरे की ओर देखा। उनकी आँखों में अतिथि के प्रति अपने कर्तव्य-निर्वाह का संतोष झलक रहा था। साथ ही उन्हें अपने श्रम के सफल होने की प्रसन्नता भी थी।

गौरैया बोली... "वाह! तुमने सचमुच बहुत अच्छा उपाय निकाला... देखो तो, हमारी मेहनत रंग लाई! अब यह ठंड से नहीं काँप रहा और खुश भी दिख रहा है।"

गौरा बोला... "अवश्य! ऐसा ही होगा। आओ, हम अपने घोंसले में चलकर बैठते हैं।" यह कहकर दोनों परिंदे अपने घरौंदे में चले गए।

अभी उन्हें घोंसले में बैठे थोड़ी ही देर हुई थी कि पेड़ के नीचे से फिर उस पथिक की आवाज़ आई।

उन दोनों ने फिर घोंसले से नीचे झाँककर देखा और उस मनुष्य की बुदबुदाती आवाज़ सुनी। वह मानो अपने आप से बातें करता हुआ कह रहा था... "ओह! उन दयालु पक्षियों की सहायता से ठंड से तो छुटकारा मिला, किंतु अब भूख लग रही है... इस अँधेरी रात में भोजन कहाँ ढूँढूँ? आह! लगता है ठंड से बचकर अब मैं भूख से मरूँगा। हे ईश्वर! मेरी यह यात्रा अत्यंत दुखदायी है।"

भूख से बिलखते अतिथि की बातें सुनकर पेड़ पर बैठे पक्षियों ने दुखी नज़रों से एक-दूसरे को देखा।

गौरैया बोली... "ओह! यह तो हमने सोचा ही नहीं कि हमें अपने अतिथि को भोजन भी कराना चाहिए... अब तो घना अँधेरा हो गया है और निकट में कोई फलदार वृक्ष भी नहीं है... अब हम क्या करें?"

गौरा भी चिंतित हो गया, उसे पूर्व की सारी मेहनत व्यर्थ जाती प्रतीत हुई। आखिर कुछ देर सोचकर उसने गौरैया से कहा...

"प्रिये! अगर हमारा अतिथि हमारे देखते-देखते भूख से मर गया, तो हमें अवश्य ही बहुत बड़ा पाप लगेगा... इसलिए हमें हर प्रकार से इसकी प्राण-रक्षा करनी ही होगी... मुझे एक ही उपाय सूझ रहा है, किंतु वह थोड़ा दुष्कर है...।"

गौरैया बोली... "कैसा भी दुष्कर कार्य करना पड़े, हम अवश्य इसके प्राणों की रक्षा करेंगे.... तुम बताओ तो सही वह उपाय क्या है...?"

गौरा बोला... "हम दोनों ही जानते हैं कि यहाँ आसपास कोई फलदार वृक्ष नहीं है और रात्रि के इस अंधकार में हमें कुछ दिखेगा भी नहीं कि हम दूर जाकर अपने अतिथि के लिए कुछ फल इत्यादि ला सकें। अतः अब यही उपाय है कि मैं इस आग में कूद जाऊँ, जिससे मुझे खाकर यह तृप्त हो जाए… और हमें अपने अतिथि को भूख से मरते हुए न देखना पड़े।"

गौरे की बात गौरैया के हृदय को तीर की भाँति लगी, वह छटपटाकर बोली... "नहीं... नहीं! तुम ऐसा मत करो... कोई और उपाय सोचो... कोई और रास्ता अवश्य होगा।"

गौरा कुछ न बोला, बस चुपचाप उसे देखता रहा। गौरैया समझ गई कि और कोई उपाय नहीं है। वह बोली... "ठीक है, अगर प्राण ही देने हैं, तो मैं दूँगी... क्योंकि मैं तुम्हारे बिना एक पल भी जीवित नहीं रहना चाहती।"

गौरा बोला... "ऐसा नहीं हो सकता... परिवार का मुखिया होने के कारण अतिथि के साथ-साथ तुम्हारी रक्षा करना भी मेरा दायित्व है, अतः मैं ही आग में कूदूँगा।"

गौरैया बोली.... "किंतु अतिथि सत्कार मेरा भी तो धर्म है और मैं इसमें तुम्हारे साथ, बल्कि ज़रूरत पड़े तो आगे रहना चाहती हूँ।"

आखिर दोनों में बहस शुरू हो गई। दोनों ही एक-दूसरे से अत्यंत प्रेम करते थे, आजीवन दोनों साथ रहे थे, इसलिए दोनों ही एक-दूसरे को मरते हुए नहीं देखना चाहते थे।

आखिरकार गौरा मानो अंतिम फैसला करता हुआ बोला.... "कुछ भी हो जाए, मैं अपने जीवित रहते तुम्हें आग में नहीं कूदने दूँगा और न ही इस अतिथि को भूखा मरने दूँगा... मेरे बाद तुम्हें जैसा उचित लगे वैसा करना।" यह कहते हुए गौरे ने बिना कुछ सुने सीधा पेड़ के नीचे जलती आग में छलांग लगा दी।

गौरे के अकस्मात ऐसा करने से हतप्रभ गौरैया चीख पड़ी.... "नहीं! रुक जाओ... ऐसा मत करो।" उसने लपक कर घोंसले से बाहर देखा और अपने जोड़े को आग में तड़पते देख मुँह फेरकर फूट-फूटकर रोने लगी।

आग के पास बैठे पथिक ने एक परिंदे को आग में गिरते देखा तो बचाने का प्रयास किया, किंतु सफल न हुआ। वह भी अकस्मात हुई इस घटना से कुछ क्षण को हतप्रभ रह गया और समझ नहीं सका कि परिंदे ने ऐसा क्यों किया। तभी उसके मन में एक बिजली सी कौंधी—"क्या यह नन्हा पक्षी अपनी इच्छा से मेरे लिए प्राण दे रहा है?" यह विचार मात्र से उसकी आँखें भर आईं, पर क्षुधा इतनी प्रबल थी कि उसने इसे ईश्वर की असीम कृपा मानकर स्वीकार कर लिया।

तथापि, उसे खाकर उस पथिक की भूख पूरी तरह शांत नहीं हुई बल्कि बढ़ गई। वह बोला... "ओह! इस थोड़े से आहार से मेरी भूख समाप्त होने की जगह और बढ़ गई... यह आग भी अब धीमी हो रही है, अतः पहले मैं थोड़ी और लकड़ियाँ लाकर इस आग को बचाता हूँ.... देखूँ शायद आसपास कुछ और खाने को भी मिल जाए।" यह सोचकर वह लकड़ियाँ इकट्ठी करने चल दिया।

उसे नहीं मालूम था कि उसके शब्द घोंसले में बैठी गौरैया ने सुन लिए हैं। गौरैया सोचने लगी.... "ओह! इस मनुष्य की बात सही है..., हम तो नन्हे-नन्हे परिंदे हैं और यह एक विशाल मनुष्य... ऐसे में हम जैसे एक पक्षी से भला इसका पेट कैसे भर सकेगा? निश्चय ही अब कर्तव्यपथ पर आत्मोत्सर्ग की बारी मेरी है। अब मुझे अवश्य ही इस आग में कूद जाना चाहिए और ऐसा करके इस मनुष्य की तृप्ति का अंतिम प्रयास करना चाहिए, अन्यथा मेरे पति का आत्मोत्सर्ग व्यर्थ चला जाएगा। वैसे भी अब मैं अपने प्रिय के बिना जीवित रहना व्यर्थ समझती हूँ, अतः अब अपने पति के दिखाए मार्ग पर चलकर शीघ्र ही उसके पास पहुँच जाऊँगी।" यह कठोर निर्णय लेकर गौरैया तत्काल पेड़ के नीचे जलती आग में कूद पड़ी और कुछ क्षण तड़पकर शांत हो गई।



लकड़ियाँ लेकर लौटे पथिक ने आग में गिरे एक और परिंदे को देखा। वह दंग रह गया! उसे समझ आ गया कि पक्षियों के उस जोड़े ने उसके लिए बलिदान दिया है। वह अपने आप से बातें करता हुआ बोला... "अद्भुत बात है! इन दोनों पक्षियों ने अग्नि में कूदकर मेरे लिए जान दे दी। मैं इसे इनकी महान कृपा समझूँगा और इन मासूम पक्षियों के लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि उन्हें इस प्राणदान का संपूर्ण पुण्य मिले। उन्हें मृत्युपरांत और अगले जन्म में सुख-शांति की प्राप्ति हो।"

फिर उसने उस गौरैया को भी खा लिया और मन ही मन दोनों पक्षियों की पवित्र आत्मा की शांति की कामना करते हुए बाकी रात उसी अलाव के पास सिमटकर काटी और प्रातः अपने मार्ग पर बढ़ गया।


'क्रमशः'

<★★★★★★★★★★>

"दोस्तों! अब आप शायद सोच रहे होंगे कि मैंने आपसे राजा-रानी की कहानी का वादा किया था, फिर यह चिड़ा-चिड़ी की कहानी कहाँ से बीच में आ गई? 😊

खैर, आप 'चिड़चिड़े' बिल्कुल मत होइए! यह उन्हीं राजा-रानी की कहानी की नींव है। प्रकृति के इन नन्हे परिंदों का यह आत्मोत्सर्ग व्यर्थ नहीं जाएगा, बल्कि यहीं से उस महान गाथा का जन्म होगा, जिसके नायक हमारे काल्पनिक राजा विक्रमादित्य यानी कि 'एक था राजा' हैं।

इन परिंदों का आगे क्या हुआ? और राजा की एंट्री कैसे हुई? यह जानने के लिए साथ बने रहिए और अगले भाग की प्रतीक्षा कीजिए।

इस कहानी और मेरी लेखनी के बारे में अपनी राय टिप्पणी (Comment) में ज़रूर साझा करें। आपके विचार ही मेरे शब्दों की असली ऊर्जा हैं।


धन्यवाद! 🙏💕"






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