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स्वीकृति

स्वीकृति

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‘ हैप्पी एनीवरसरी।’ इंद्र ने चाय की ट्रे साइड टेबल पर रखकर उसे आगोश में लेते हुए प्यार भरा चुंबन अंकित करते हुए कहा।

‘ सेम टू यू।’ कामिनी ने भी उसी गर्मजोशी से प्रत्युत्तर दिया।

पच्चीस वर्ष आज हो गये हैं पर एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि इंद्र उसे विश करना भूले हों। सुबह की चाय भी वही बनाते थे। उनका कहना था पूरे दिन तो तुम करती ही रहती हो कम से कम सुबह की चाय ही मुझे बनाने दिया करो। उनकी इसी भावना और इसी सोच के कारण ही तो वह उन पर मर मिटी थी।

‘ आज एक्सट्रा क्लास लेनी है अतः जल्दी जाना है। आने में भी देर हो सकती हैतुम्हारे लिये गाड़ी भेज दूँगा।’ इंद्र की आवाज ने उसका ध्यान भंग किया।

‘ आज मैंने छुट्टी ले ली हैआज अमित और दिव्या आने वाले हैंकुछ तैयारी करनी है।’

‘अच्छा किया, छुट्टी ले लीकुछ दिनों के लिये ही तो वे आ रहे हैं, कुछ मँगाना हो तो सीताराम ड्राइवर को कह देना वह ले आयेगा। मैं गाड़ी उन्हें लेने भेज दूँगा , उनकी ट्रेन दो बजे आयेगी न।’

‘ मैंने सीताराम को कह दिया हैंऔर आप भी जल्दी आने की कोशिश करियेगा, लंच सब साथ करें तो अच्छा रहेगा।’

‘ जो हुक्म मेरे आका।’ कहते हुए इंद्र ने अपना हाथ सीने पर रखकर सिर झुकाया।

‘ आपकी मसखरी की आदत कब जायेगी?’ कहते हुए वह उसकी इस अदा पर खिलखिलाकर हँस पड़ी थी।

‘ हाँहाँ हँसो, खूब हँसोहम हँसने के ही तो काबिल हैं।’ किंचित क्रोध में इंद्र ने कहा।

‘ अरे, आप तो गुस्सा हो गये, मैं तो ऐसे ही हँस पड़ी थी।’ रूठे इंद्र को मनाने की चेष्टा करते हुये कामिनी ने कहा।

‘ मैं भी गुस्सा कब हुआ था ? मैं भी ऐसे ही कह रहा था।’ इंद्र ने हँसते हुए प्रतिउत्तर दिया।  

रूठना मनाना, नोक झोंक तो वैवाहिक जीवन के अहम् हिस्से हैं, ऐसा कामिनी का मानना था। बिना इनके जीवन के सारे रंग अधूरे हैं पर अति हर चीज की बुरी होती है इसलिये बात बिगड़ने से पूर्व ही वह सदा बिगड़ी बात संभालती रही थी। 

इंद्र को कालेज भेजकर दोपहर के खाने की तैयारी कर वह अमित और दिव्या का कमरा ठीक करने लगीअलमारी व्यवस्थित करने के इरादे से उसने अलमारी खोली तो ‘ हैप्पी वैडिंग ’ की एलबम पर नजर पड़ते वह उसे खोलने का लोभ संवरण नहीं कर पाईजैसे-जैसे उसे वह खोलती गई अतीत परत दर परत खुलता गया। याद आये वह पल जिन्होंने उसके जीवन का रूख अवश्य बदल दिया था…

‘ अंधेरे में क्या कर रहे हो इंद्र ? लाइट तो कब की जा चुकी है और तुम किताब हाथ में लिये बैठे हो !! चलो सभी बाहर लान में बैठे हैं।’ कामिनी ने घर के अंदर प्रवेश किया तो नागेन्द्रइंद्र को हाथ में किताब लेकर पाठ याद करते देखकर कहा।

‘ अंधेरा तुम लोगों के लिये होगा कामिनीमेरे लिये क्या अंधेरा क्या उजाला ?’ इंद्र ने सहज स्वर में कहा।

‘ मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं थाप्लीज इंद्र, मुझे क्षमा कर दो।’ अपनी गलती का एहसास होते ही कामिनी ने पश्चाताप भरे स्वर में कहा।

‘अरे ! क्षमा माँगने की क्या आवश्यकता है ? मुझे तो ऐसे वाक्य सुनने की आदत सी पड़ गई है।’ उसने निर्विकार स्वर में कहा।

इंद्र के द्वारा कहे शब्दों ने उसके दिल में हाहाकार मचा दियाकिसी भी व्यक्ति की शारीरिक कमी की ओर इंगित कर, उसका उपहास उड़ाना एक गंभीर अपराध नहीं तो और क्या है ? पर उसने जानबूझ कर तो ऐसा नहीं किया था। पता नहीं कैसे बेध्यानी में अचानक शब्द उसकी जुबां से फिसल गये थे पर यह बात वह उसे अब चाहकर भी समझा नहीं सकती। वह तो औरों की तरह ही उसे समझेगा। मुँह से निकली बात और धनुष से निकला तीर कभी लौटकर नहीं आता, यह बात भी वह अच्छी तरह जानती थी अतः पछताने से कुछ फायदा नहीं था लेकिन भविष्य में उसकी किसी बात से उसका मन न दुखे, इस बात का वह सदा ध्यान रखेगी, सोचकर उसने मन को सांत्वना दी।

इंद्र उसके पड़ोसी दिनेश वर्मा का लड़का है। वे कुछ दिन पूर्व ही यहाँ रहने आये थे। कुछ ही दिनों में दोनों परिवारों में इतनी दोस्ती हो गई थी कि दिन रात का उठना बैठना, खाना पीना साथ-साथ होने लगा था। लोड शेड़िग के कारण वह समय व्यतीत करने उनके घर गई थी तथा उसे अँधेरे में पढ़ता देखकर अनायास ही उसके मँुह से निकल गया। उसे ध्यान ही नहीं रहा कि दो खूबसूरत, बड़ी-बड़ी आँखें होने के बावजूद वह देख ही नहीं सकता है।

इंद्र की आँखें देखकर लगता ही नहीं था कि उनमें रोशनी नहीं हैसच्चाई जब उन्हें पता चली तो एकाएक विश्वास ही नहीं हुआ पर सच को कभी झुठलाया जा सकता है। इंद्र के पिता जो स्वयं एक डाक्टर थे जिनका अपना जीवन दूसरों के दुख दर्द दूर करने में बीतता रहा था, को जब स्वयं अपने बच्चे की अपंगता का पता चला तो वह सन्न रह गये थे। कहाँ-कहाँ उसे नहीं दिखाया पर सब व्यर्थआखिर उन्होंने स्थिति से समझौता कर लिया। वह चाहते थे कि इंद्र आत्मनिर्भर बने। इसके लिये उसके माता-पिता ने प्रारंभ से प्रयत्न करना प्रारंभ कर दिया। अंधे व्यक्तियों की विभिन्न समस्याओं और देखभाल से संबंधित जो भी किताब उन्हें मिलती, वह खरीदते तथा उससे मिली जानकारी के आधार पर उसे अपना काम करने की शिक्षा देते। सुबह शाम उसे साथ लेकर पार्क में घूमने जाते। पार्क में लगे हर झूले के बारे में उसे बताते तथा उसे उपयोग करने का तरीका बताते। उनकी कोशिश रहती कि वह स्वयं उस झूले पर जाए और उसका उपयोग करेउनकी ट्रेनिंग का ही असर था कि वह बचपन से ही अपना हर काम स्वयं करने लगा था।

समय पर दिनेश जी ने इंद्र का अंधविद्यालय में नाम लिखवा दिया पर सिर्फ नाम लिखवा देने से मात्र से उन्होंने अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं समझी वरन् उसे पढ़ाने के लिये स्वयं ब्रेललिपि सीखी। संबंधित विषय की अच्छी से अच्छी पुस्तक उसे लाकर देते। जो नहीं मिलती, उसे अन्य पुस्तक से पढ़कर ओडियो कैसेट बनाकर उसे दे देते जिससे कि वह उसे सुनकर कंठस्थ कर सके। शिक्षा में हर संभव सहायता करने के साथ-साथ उन्होंने उसे आत्मनिर्भर बनाने का हर संभव प्रयास करते। दिनेश ही नहीं, उसकी माँ सीमा भी उसे अपनी-अपनी तरह से शिक्षा दे रहे थे जिससे जीवन समर में उसे कोई परेशानी न हो।  

उसे फ्रिज से स्वयं पानी निकाल कर पीते देख या घर में बिना किसी की सहायता के इधर-उधर घूमते देख उसे अत्यंत आश्चर्य होता था। कभी-कभी सोचती कि हो सकता है उसे थोड़ा बहुत दिखाई देता होपर ऐसा नहीं था। एक बार वह अपनी मम्मी के साथ उनके घर गई थी। वे सब बातें कर रहे थे कि इंद्र एक ट्रे में चाय और नाश्ता लेकर आयामाँ कुछ कहती उसके पूर्व ही सीमा आंटी ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा,‘ यह मेरा बेटा ही नहीं बेटी भी है। मैंने इसे सब सिखाया है। किचन में भी यह मेरी हैल्प करता है।’

उस समय वह और उसकी ममा यह सोचकर आश्चर्यचकित रह गये थे कि बिना आँखों केे इंद्र कैसे इतना सब कर पाता है ? यहाँ तक कि उसकी ममा ने उसे भी इंद्र से कुछ शिक्षा लेने को कहा था क्योंकि वह सदा घर के कामों से दूर भागती रही थी।

वह और इंद्र एक ही कक्षा में थे। स्कूल अवश्य अलग थे। विषय एक होने के कारण एक बार कामिनी किसी टॉपिक पर अनायास ही उससे डिस्कशन करने लगी। उसने उस टॉपिक को इतने सहज और आसान तरीके से उसे समझाया कि उसे लगा कि इतनी आसान सी बात उसको समझ में क्यों नहीं आ रही थी ? उसके पश्चात् तो वह अक्सर ही अपनी हर समस्या को लेकर उसके पास जाने लगी। विषय से संबंधित उसका ज्ञान तथा उसको समझाने का तरीका कठिन से कठिन टाॅपिक को आसान बना देता थावास्तव में उसमें विलक्षण प्रतिभा थी। वह किसी भी विषय को सिर्फ एक बार सुनकर कंठस्थ कर लेता था। यहाँ तक कि गणित जैसे गूढ़ विषय के प्रश्नों को भी चुटकियों में हल करने की उसकी क्षमता उसे आश्चर्यचकित कर देती थी अतः वह जब तब पढ़ाई में उससे सहायता लेने चली जाया करती थी। उसके साथ का परिणाम था कि जहाँ वह पढ़ाई से दूर भागती थी वहीं अब वह कक्षा में पहले दस विद्यार्थियों में आने लगी थी।

इतना सब करने के बावजूद भी जब लोग उसे बेचारा कहते या उस पर दया दिखाते तो पता नहीं क्यों उसे अच्छा नहीं लगता था पर किसी का मुँह बंद कर पाना किसी के लिये संभव नहीं है। लोग भले इंद्र को दिव्यांग कहकर उसका तिरस्कार करते रहे हों पर उसे वह कभी दिव्यांग नहीं लगा, आखिर क्या कमी है उसमें ? वह अपना हर काम स्वयं कर लेता है यहाँ तक कि पढ़ाई में भी उसका मुकाबला सामान्य लोग नहीं कर पाते हैं।

अपनी मेहनत, लगन के कारण जब इंद्र की मैट्रिक में मैरिट आई तथा शारीरिक रूप से अक्षम छात्रों में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ तो इंद्र और उसके माता-पिता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। कामिनी भी उसकी सफलता पर बेहद खुश थी जबकि वह स्वयं प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण हो पाई थी।

हायर सेकेंडरी की परीक्षा भी उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इस बार भी कामिनी के उससे कम अंक आये थे पर फिर भी न जाने क्यों उससे उसे जरा भी ईष्र्या नहीं हुई थी।

‘ तुम क्या बनना चाहोगे ?’ एक बार बातों ही बातों में उसने उससे पूछा।

‘ बनना तो अपने पिता की तरह डाक्टर चाहता था लेकिन मेरी अपंगता इस क्षेत्र में जाने की इजाजत नहीं देगी अतः मैं टीचर बनकर देश और समाज की सेवा करना चाहता हूँ क्योंकि मेरे विचार से जहाँ अच्छा डाक्टर शारीरिक व्याधियों को दूर कर मनुष्य को स्वस्थ करता है वहीं एक शिक्षक व्यक्ति का मानसिक विकास कर उसे एक अच्छा नागरिक बना सकता है और एक अच्छा नागरिक ही देश और समाज के उत्थान एवं नवनिर्माण में सहायक होता है।’ उसने उत्तर दिया था।

वह इतिहास से एम ए करना चाहता था। किसी देश का गौरवपूर्ण इतिहास ही भविष्य के निर्माण में सहायक होता है, ऐसा उसका मानना था। वह उसके विचार एवं ध्येय सुनकर आश्चर्यचकित थी सचमुच कितने बच्चे उम्र के इस नाजुक पड़ाव पर सही निर्णय लेने में सक्षम हैं !! जबकि वह स्वयं इस समय तक सोच नहीं पाई थी कि उसे क्या बनना है, क्या करना है? यह लोगों का भ्रम है कि अपंगता लक्ष्य प्राप्ति में बाधक होती है यदि मन में उत्साह एवं उमंग हो तो इंसान सब कुछ कर सकता है। बेटे की अपंगता के कारण जो माता-पिता व्यथित थे, आज उसकी सफलता पर खुश थे। उन्हें लगने लगा था कि उनके पुत्र ने अपनी मंजिल तलाश ली हैवह इतना तो सक्षम बन ही जायेगा कि जिंदगी में कभी किसी के सामने हाथ न पसारना पड़े।

पुत्र की हर इच्छा को साकार करने का उन्होंने हरसंभव प्रयास किया था पर परिश्रम तो उसका अपना था। उन्हें साधन ही उपलब्ध कराने थे। कामिनी ने भी जब ग्रेजुएशन में वही विषय लिये तो वे और भी निश्चिन्त हो गये क्योंकि वे सोचते थे कि उसकी सफलता में कामिनी का भी विशेष योगदान है। कामिनी समय पर उसे विषयवस्तु से संबंधित सामग्री भी लाकर देती रही थी। यदि इंद्र को उसका साथ नहीं मिलता तो शायद सच्चे मित्र के अभाव में वह इतना अच्छा नहीं कर सकता थापर कामिनी को ऐसा नहीं लगता था कि सिर्फ किताबें लाकर देने से ही किसी को सफलता मिल सकती है। जब तक कि व्यक्ति में कुछ करने या पाने की ललक न हो उसे चाहे कितनी भी सुविधायें दी जायें वह कुछ नहीं कर सकता। कामिनी के माता पिता को यद्यपि इंद्र के साथ उसका इतना उठना बैठना पसंद नहीं था किन्तु कामिनी के यह कहने पर किसी का दुख दर्द बाँटने में क्या बुराई है ? सुनकर वे चुप हो जाते थे।

दिन बीतते गयेउसके विवाह की बातें घर में उठने लगी तो एकाएक उसे महसूस हुआ कि वह इंद्र के बिना रह ही नहीं पायेगी। पंद्रह वर्षो में उसे उसके साथ की आदत पड़ गई है। उसके बिना कहे ही उसकी हर बात समझने लगी है वहीं इंद्र भी उसके कदमों की आहट से ही उसे पहचानने लगा है। पता नहीं उसके मन में उसके लिये प्यार का यह अंकुर कब पैदा हुआ था पर कुछ तो ऐसा था कि उससे विलग होने मात्र से वह विचलित हो उठी थी। अतः उस समय उसने विवाह के लिये यह कहकर मना कर दिया कि अभी वह पढ़ना चाहती है।

समय बहता गया और साथ-साथ सफलतायें भी कदम चूमती गई। वह दिन भी आ गया जब पोस्टग्रेजुएशन के साथ ही उसे अपने ही कालेज में लेक्चरशिप का आफर मिला, साथ ही डाक्टरेट करने की अनुमति भी मिल गई। कम से कम अब वह स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम थी। यद्यपि कालेज में लेक्चरशिप के लिये चयनित सूची में इंद्र का भी नाम था किन्तु उसके अंधत्व के कारण मैनेजमेंट के कुछ सदस्य उसके चयन के विरूद्ध थे अंततः उसके एकेडमिक रिकार्ड को देखते हुए मेनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष ने उसे नियुक्त कर ही लिया।

उसका यह नियुक्ति पत्र भी उसने ही इंद्र तक पहुंचाया तो एकाएक उसे विश्वास ही नहीं हुआइंद्र को अपनी योग्यता पर तो विश्वास था पर दुनिया वालों पर नहींएकाएक उसकी झोली में इतनी खुशियाँ आकर बिखर जायेंगी, उसने सोचा ही नहीं था।

दोनों परिवारों में खुशियों का आदान प्रदान चल ही रहा था कि अचानक कामिनी ने यह कहकर कि वह इंद्र से विवाह करना चाहती है, सबको आश्चर्य में डाल दिया। कामिनी के माता-पिता तो बौखला ही उठे थेे यह सोचकर कि लड़की पागल हो गई है वरना एक अंधे व्यक्ति के साथ जीवन की डोर बाँधकर कोई स्वस्थ मानसिकता वाला निज जीवन को अंधकूप में ही ढकेलेगा। उसकी माँ ने उसे निर्लज्ज एवं बेहया तक कह दिया था जिसने स्वयं विवाह का प्रस्ताव रखकर न केवल अपनी वरन् उनकी इज्जत भी सरे आम नीलाम कर दी है।

‘ बेटा, विवाह कोई बच्चों का खेल नहीं है कि आज कर लिया और कल तोड़ दिया। हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैतुम्हारा भला ही चाहते हैं अतः जो भी निर्णय करना सोच विचार कर ठंडे दिमाग से करना।’ उसके पिता ने उसे अपने प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करने की सलाह देते हुए समझाते हुए कहा था।

‘ विवाह केवल आदर्शो के लिये नहीं किये जाते, व्यवहारिक स्तर पर भी उन्हें सफल होना चाहिये। भावावेश में लिये गये निर्णय न केवल अपने लिये वरन् सभी के लिये अशांति का कारण बन जाता है। ’ इंद्र के माता-पिता ने भी उसे समझाने का प्रयत्न किया था।

‘ अंकल, जहाँ तक निर्णय की बात है, मैंने आज से पाँच वर्ष पूर्व ही ले लिया था। इतने वर्षो में वह पल भर के लिये नहीं डिगा, इसलिये मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि मुझे अपने निर्णय पर कभी पश्चाताप नहीं होगा और न ही किसी को करने दूँगी।’ सहज स्वर में उसने कहा था।

‘ यदि मैं विवाह ही न करना चाहूँ ?’ अचानक कमरे में प्रवेश करते हुए इंद्र ने सहज भाव से कहा।

‘ तो कोई बात नहीं, मैं भी विवाह नहीं करूँगी।’ कहकर वह कमरे से बाहर चली गई थी।

दोनों परिवारों में वर्षो से चली आ रही मित्रता को ग्रहण लग गया थावे लोग एक दूसरे से मिलने से भी कतराने लगे थे। जहाँ वे दोनों पहले एक साथ कालेज आते जाते थे, अब अलग-अलग जाने लगे थे। दो वर्ष बीत गये पर उनके विचारों में कोई अंतर नहीं आया था। उधर इंद्र के पढ़ाने के तरीके से प्रभावित होकर कुछ छात्र उससे घर भी पढ़ने आने लगे थेवह दिनोदिन व्यस्त होता चला गया या स्वयं को व्यस्त रखने का प्रयत्न करने लगा।

जीवन जड़ हो चला था, चलना विवशता बन गई थीउस दिन मन कुछ ठीक नहीं था, कामिनी ने छुट्टी ले ली थी। समय बिताने के लिये पेपर लेकर बालकनी में बैठ गई। दिसम्बर की गुनगुनी धूप बहुत ही अच्छी लग रही थी। अचानक इंद्र के घर से चीखने की आवाज सुनकर वह उसके घर गईसंयोग से दरवाजा खुला थाआवाज का अनुसरण करती हुई वह किचन में गई तो देखा कि माँजी जमीन पर गिर गई हैं तथा उठने का प्रयास कर रही हैं पर उठ नहीं पा रही हैं।

वह उन्हें उठाने की कोशिश कर ही रही थी कि उसका अनुसरण करती हुई माँ भी आ गई। दोनों ने उन्हें उठाकर पलंग पर लिटाया। इंद्र के पापा कहीं बाहर गये हुए थे तथा इंद्र कालेज में था। फोन पर माँजी के गिरने की सूचना देकर कामिनी ने अपने पापा को भी इस दुर्घटना की सूचना दे दी थीवह अपने साथ डाक्टर को भी लेकर आ गये।

‘ लगता है हड्डी टूट गई है इसलिये एक्स रे कराना पड़ेगा, तभी कुछ कहा जा सकेगा, आप इन्हें अस्पताल ले जाइये।’ डाक्टर ने चैक करके कहा

तब तक इंद्र भी आ गया था। सब उन्हें लेकर अस्पताल गये। एक्स रे रिर्पोट से पता चला कि उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई है, आपरेशन करना पड़ेगा। ठीक होने में कम से कम तीन महीने लगेंगे। कामिनी के पिता ने ही फोन करके इंद्र के पिता को इस दुर्घटना की सूचना दे दी थी लेकिन किसी भी हालत में वे कल से पहले नहीं आ सकते थे।

पड़ोसी होने के नाते सहायता करना उनका कर्तव्य था वैसे भी वे उन प्राणियों में से नहीं थे जो मामूली बात को गाँठ में बाँधकर बैठ जाते हैं। पडोसी के सुख-दुख में काम आना वे अपना नैतिक कर्तव्य ही नहीं अपना अधिकार समझते थे। परिस्थितियों के अनुसार अपने व्यवहार को नियंत्रित करने की कला ही जीवन को संतुलित रखती है, इसका उन्हें एहसास था। कामिनी की माँ को घर भी देखना था अतः कामिनी को ही अस्पताल में रात्रि में रूकना पड़ा। इंद्र को जबरदस्ती घर भेज दिया था। 

कामिनी को एकांत में पाकर दर्द की अवस्था में भी वह ममतामई पूछ बैठी, ‘क्यों अपना जीवन बरबाद कर रही हो बेटी, कोई अच्छा सा लडवका देखकर विवाह क्यों नही कर लेती ?’

‘ माँजी, यह बात आप अपने बेटे की हालत देखकर भी कह रहीं हैं !! क्या आप नहीं जानतीं हैं कि वह कितना अकेला हो गया है। वह सिर्फ इसलिये मुझसे विवाह नहीं करना चाहता क्योंकि वह सोचता है कि मैं उससे विवाह करके उस पर दया कर रही हूँ लेकिन ऐसा नहीं है माँजी, मैं उससे सचमुच प्यार करने लगी हूँ तथा मेरा निश्चय अटल हैकभी-कभी सोचती हूँ कि शायद मेरे प्यार में ही कोई कमी रह गई है जो आप सब मुझे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।’

‘ नहीं बेटी, तुममें कोई कमी नहीं है। तुम तो देवी हो। तुमने मेरे इंद्र को आँखें ही नहीं दीं वरन् उसमें आत्मविश्वास भी पैदा कियाआज वह जो कुछ है वह तुम्हारे ही कारण है। मैं भी अपने बेटे को पहचानती हूँ वह कहता कुछ नहीं है लेकिन बिना कहे ही कभी-कभी अपने व्यवहार से बहुत कुछ कह भी जाता है। डरती हूँ कि कहीं असुरक्षा की भावना उसे कुंठित न कर दे, परन्तु मैं विवश हूँ बेटी, अपने बेटे की खुशी के लिये मैं तुम्हारा जीवन कैसे बर्बाद कर सकती हँूऔर फिर तुम्हारे माता पिता भी तो इस रिश्ते को।’

‘ आप ठीक कहती हैं बहनजी, हमारे अहंकार ने इन दोनों के पवित्र प्यार को नहीं समझापहचाना मैं आपसे वायदा करता हूँ कि आपके ठीक होते ही दोनों को विवाह सूत्र में बाँध दूँगा।’ कामिनी के पिता नरेश शर्मा जो उनके लिये दवाइयाँ एवं फूल लेकर आये थे, अंदर आते हुए कहा,शायद उन्होंने उन दोनों की बातें सुन लीं थीं।

उन्होंने अपना वचन पूरा भी किया थाइंद्र को समझाने में भी उन्हें काफी मेहनत करनी ही पड़ी साथ ही माँ तथा परिवार के अन्य सदस्यों ने इस विवाह का विरोध भी सहना पड़ा था। उसके इंद्र से विवाह करने के निर्णय से घर में पिता के अलावा कोई भी खुश नहीं था। पिताजी भी शायद उसकी जिद ही पूरी कर रहे थेपर अन्य सदस्यों का मानना था कि उसका प्यार, प्यार नहीं वरन् दया है जिसके लिये आज नहीं तो कल उसको पछताना पड़ेगा तब न केवल उसे वरन् बेकसूर इंद्र को भी अपनी असहायता पर लज्जित होना पड़ेगा।

उनका विवाह हैप्पी बिगनिंग या बैड आफ रोजेज नहीं होगाइसका उसे अंदाज था। जीवन के हर मोड़ पर आने वाली कठिनाइयों से जूझने को वह तैयार थीपर कभी-कभी उसे लगता था कि कहीं वह चुकती तो नहीं जा रही है। विशेषतया तब जब लोगों के उलजलूल प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता चाहे वह कालेज के पढ़े लिखे लोग हों या दूध वाले सब्जी वाले जैसे अनपढ़ लोगउनके चेहरे पर टँगे प्रश्न, उनकी जिज्ञासा देख, लगता था कि मानसिक धरातल सब एक जैसे हैं। भला किसी की निजी जिंदगी से किसी को क्या मतलब ? पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी जिंदगी से ज्यादा दूसरों की जिंदगी में झाँकने में ज्यादा आनंद आता है।  

जब वह पहली बार माँ बनने की ओर अग्रसर हुई तो पता नहीं लोगों की बातों का असर था या कुछ और, उसके मन में अज्ञात भय बैठ गया कि कहीं उसकी संतान भी दिव्यांग न होमन से जितना इस विचार को भगाने की कोशिश करती उतना ही यह कुत्सित विचार उस पर हावी होता चला जाता तब मन में आता कि कहीं उसका यह निर्णय भावावेश में लिया हुआ निर्णय तो नहीं था। दूसरे ही क्षण नकारात्मक विचारों को परे धकेल कर मन को समझातीनहीं वह इंद्र को प्यार करती थी तथा यह आने वाला फूल भी उसी प्यार का नतीजा हैयह कोई आवश्यक नहीं कि इंद्र का बच्चा भी इंद्र की तरह ही हो। वह उसकी तरह भी तो हो सकता हैसदा अच्छा सोचो, अच्छा ही होगा, के सूत्र को अपनाते हुए उसने अपने नकारात्मक विचारों को झटक कर सकारात्मक सोच अपनाई। नतीजा भी अच्छा ही निकला बच्चा नारमल थापरिवार में भरपूर खुशियाँ मनाई गई।

इंद्र भी बहुत खुश थेनैपी बदलने से लेकर वह बच्चे की हर छोटी-मोटी जरूरतें पूरा करने को तत्पर रहते। कभी कहीं ऐसा नहीं लगता था कि वह देख नहीं सकते हैं। काम की उन्हें ऐसी आदत पड़ गई थी कि वह अपने हर काम के अतिरिक्त घर का छोटा मोटा काम भी बिना उसकी सहायता के कर लेते थे। नन्हा अमित भी उनसे भली प्रकार हिल गया था। उनको देखते ही उनकी गोद आने को लपकतान जाने कैसे इंद्र भी उसके मनोभावों को समझकर उसे गोद में उठा लेतेशायद जिनकी एक इंद्रिय विकसित नहीं होती उनकी अन्य इंद्रियाँ अधिक सक्षम होकर उसकी उस कमी को पूरा कर लेती हैं।

अमित के तीन वर्ष का होने पर उसे स्कूल में दाखिल करवायानन्हे मासूम ने घर की दुनिया से हटकर एक अलग दुनिया में कदम रखा था। यह दुनिया उसके लिये नई थी जहाँ उसके मम्मी पापा के अतिरिक्त अन्य लोग भी थेउसके दोस्त उसकी मैम। घर आकर वह उनके बारे में, स्कूल की अन्य बातों के बारे में उसको बताता।

घर के अन्य सदस्यों द्वारा अब दूसरे बच्चे के लिये दबाव पड़ने लगा था। यद्यपि वह दूसरा बच्चा नहीं चाहती थी क्योंकि उस पर फिर वही डर हावी हो जाता था। अन्यों के अलावा इंद्र को भी लगता था कि कम से कम दो बच्चे तो होने ही चाहिए जिससे बच्चे को अकेलेपन का एहसास नहीं होगा। सुख-दुख में कम से कम कोई तो होगा जिसे अपना कह सकेगा। इसके साथ ही इससे उसे सामाजिक बनने, एक दूसरे के साथ रहने, निभाने की आदत भी रहेगी वरना अकेला बच्चा समाज से दूर आत्मकेन्द्रित होता चला जाता है। उसकी खुशी के लिये उसने दुबारा मातृत्व स्वीकार करने का मन बना लिया था।

घर बाहर की जिम्मेदारी निभाते हुये वह बुरी तरह थक जाती थी पर गृहस्थी में तो यह सब चलता ही रहता है, सोचकर दुगने मन से वह काम में लग जाती। इसी वजह से वह सबकी चहेती बनी हुई थी। वह दिन भी आ गया जब उसकी कोख में दूसरा कमल खिल उठा। पूर्णतः स्वस्थ बेबी गर्ल ने आकर उनकी सारी इच्छाओं को पूरा कर दिया था। उनकी पूर्ण परिवार की कल्पना साकार हुई थी। उसका नाम दिव्या रखा। इंद्र बेहद खुश थे पर अमित की ओर से शंका थी कि वह उसे स्वीकार कर भी पायेगा पर उसने उसे स्वीकार कर लिया था। वह उसे देखकर बहुत खुश हुआ आखिर उसे घर में भी एक दोस्त जो मिल गया था।

पर शीध्र ही उसकी खुशी निराशा में बदल गई क्योंकि जिसे वह अपना दोस्त समझ रहा था वह तो उससे बोलता ही नहीं था। सारे दिन सोता या रोता रहता। उसे भी जब देखो नन्हे को गोद में लिये उसका काम करते देख वह ईष्र्या से भर उठता था ऐसे समय इंद्र ही उसे संभालते, उसको अपने साथ लेकर सोते, उसको कहानी सुनाते। तब उसे लगता न देख पाने के बावजूद वह जिंदगी को कितनी सहजता से जी रहे हैंअपने पूरे दायित्वों को निभाते हुए उन्होंने उसे वे सारी खुशियाँ दी जो शायद एक आम आदमी दे भी नहीं दे पाता।

जिंदगी गुजर रही थीअपनी लय और ताल के साथ, सीमित गति से। एक दिन अमित स्कूल से आया तो देखा कि उसके कपड़े धूलधूसरित हो रहे हैं तथा चेहरे पर अजीब खामोशी थी। बहुत कुरेदने पर बोला,‘ ममा, पापा औरों की तरह देख क्यों नहीं सकते ?’

‘ बेटा, आखिर बात क्या है ? तुम यह क्यों पूछ रहे हो ?'

‘ ममा, आज एक लड़के से टकरा गया तो उसने मुझसे कहा देखकर नहीं चला जाता, तू भी क्या अपने पिता की तरह अंधा है ? मुझे भी गुस्सा आ गया मैंने भी उसे पीट दिया तभी हमारी टीचर आ गई। सारी बात सुनकर उन्होंने मुझे डाँटते हुए कहा आखिर उसने गलत क्या कहा ? ममा, मैं उससे टकराया था तो वह भी तो मुझसे टकराया था फिर उसने मुझे अंधा क्यों कहा !! मेरे पापा अंधे हैं तो इसमें मेरा क्या दोष ?’

‘बेटा, अपना आक्रोश किसी को शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर नहीं वरन् मानसिक रूप से उसे पछाड़़ कर निकालो, तभी तुम वास्तव में उसे हरा पाओगे। वह तुमसे, तुम्हारी योग्यता से डर रहा है तभी ऐसा कहकर उसने तुम्हें कमजोर करने की कोशिश की है। अपने पापा को देखो, अगर वह ऐसी बातों पर ध्यान देते तो क्या सफल हो पाते?’

‘ पर ममा, मैं अपने पापा का अपमान कैसे सहता?’ कहते हुए वह रो पड़ा था।

 ‘ कुछ बातें ऐसी होती हैं बेटा, जब मुँह बंद कर रहना ही ठीक होता है। तुम जितना चिढ़ोगे लोग उतना ही और चिढ़ायेंगे अतः इन सब बातों पर ध्यान मत दो सिर्फ पढ़ाई में ध्यान लगाओ अगर तुम अच्छा करोगे तो लोगों का मँुह स्वयं बंद हो जायेगा। अब चुप हो जा मेरे बच्चे, मैं कल ही तेरी टीचर से बात करूँगीआखिर वह गलत बात का समर्थन कैसे कर सकती हैं?’ कामिनी ने उसके आँसू पोंछते हुए कहा।

पता नहीं वह उसकी बातों के मर्म को समझ पाया या नहीं पर वह स्वयं अंतद्र्वन्द्व के कारण पूरी रात सो नहीं सकी। यह तो पहला कंकड़ था पर वह क्या नित्य पड़ते ऐसे कंकड़ों को रोक पायेगी? कहीं इन बातों को सुनकर बच्चे कुंठित या हीनभावना के शिकार न हो जायेंनहींनहीं, उसे बच्चों को मजबूत बनाना पड़ेगा। वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर लोगों की मानसिकता ऐसी क्यों होती हैकिसी की कमजोर नस को पहचान कर उस पर वार करना, क्या मानसिक विकलांगता का द्योतक नहीं है? वह तो अच्छा था कि उस समय इद्र घर में नहीं थे वरना उनके आत्मसम्मान को भी ठेस पहुँचती।

उसे याद आया वह पल जब एक दिन वे सब एक रेस्टोरेंन्ट में खा रहे थे कि उनको देखकर एक व्यक्ति बोला, ‘ वह देखो, उस टेबल पर, वह आदमी अंधा है, पर बीबी बच्चे कैसे सुंदर है, क्या किस्मत पाई है ?’  

उसने सुनकर भी अनसुना कर दिया था। उस दिन इंद्र भी खोये-खोये लगे पर उसने अपने व्यवहार से उनके मन की कुंठा को यह कहकर दूर कर दिया था कि दूसरों के शब्दों पर ध्यान न दो, दुनिया क्या कहती है, उससे हमें क्या मतलब? ’

दुख तो उसे इतना था कि बाहरी तो बाहरी पर उसके अपने सगे संबंधी, उसके सगे भाई बहन जिन्हें वह बेहद अपना समझती रही, ने भी उससे किनारा कर लिया था। उन्हें अपने अंधे जीजाजी जी को किसी से मिलवाने में शर्म आती थी। जीवन में आई हर परेशानी पर उसे उसकी गलती की याद दिलाते रहते। हर परेशानी का कारण उसे ही मानते रहे। उसे उपदेश देते समय वे भूल जाते थे कि सुख-दुख तो हर एक के जीवन का अंग हैं फिर भला इसमें इंद्र्र का क्या दोष ? उसने अपनी अपंगता पर अपने आत्मबल से विजय पाई है। वह तो सिर्फ उसकी हमसफर बनी थी। वह जो कुछ था अपने प्रयत्नों के कारण था पर फिर भी तथाकथित हितैषी उनके संबंध को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। वह उनकी सफेद चादर में लगा एक ऐसा दाग बन गई थी जिसे प्रयत्न करने के पश्चात् भी मिटाया नहीं जा सकता था तभी जब भी अवसर पाते ही उस पर तानों की बौछार हो ही जाती।


स्वयं को, इंद्र को और बच्चों को भावात्मक रूप से संभालते हुए कभी-कभी उसे लगता कि उसका संयम समाप्त होता जा रहा है। कभी लगता कि बच्चे हीनभावना का शिकार होकर कहीं इंद्र को कुछ कह न दें। वह उनके हर प्रश्न का माकूल उत्तर देने का प्रयास करती, डरती कि कहीं उससे कोई चूक न हो जाये। कहीं किसी की बात से बच्चों के बालमन पर ठेस न लग जाये। वह स्वयं तो अभ्यस्त हो गई थी ऐसी बातें सुनते-सुनते पर बच्चे तो हीनभावना के शिकार हो सकते हैं। यही कारण था कि वह किसी भी सामाजिक समारोह यहाँ तक सार्वजनिक स्थान में भी जाने से परहेज करने लगी थी।

निर्णय उसका अपना था अतः उसने मार्ग में आये हर काँटे को बखूबी निकाल फेंकने का प्रयत्न किया था। दर्द स्वयं सहा था तथा हर संभव खुशी इंद्र्र को देने का प्रयास किया थातमाम विरोधों के बावजूद भी उसने सिद्ध कर दिया था कि उसका निर्णय भावावेश में लिया गया नहीं है। उसने खूब सोच समझ कर अपने कदम बढ़ाये थे तथा साथ-साथ चले भी, अपने निर्णय पर उसे कभी भी पश्चाताप नहीं हुआ।

पर आज यह घटनादूसरे दिन टीचर से बात की तो उसने अपनी गलती मान लीपर अमित का बालपन कहीं खो गया था। अब वह स्कूल से आकर अपने कमरे में ही बैठा रहताजहाँ पहले अपना समय वह टीवी देखने या कंप्यूटर पर गेम खेलने बिताता था अब वही जब देखो पढ़ता रहता।

कभी अगर वह उसके साथ बैठकर बातें करना चाहती तो कह देताममा मुझे पढ़ना है। एक दिन तो हद ही हो गई टीचर पेरेंन्टस मीटिंग थी, स्कूल जाने से पहले उसने उससे कहा था,‘ ममा, आप अकेले ही आना।’

उसे उससे डर लगने लगा था कि कहीं वह मानसिक रूप से अस्वस्थ तो नहीं होता जा रहापर उसमें ऐसा कुछ असामान्य भी तो नहीं लग रहा था। स्कूल में जब टीचर से मिली तो उसे भी उसकी तारीफ करते पाया। सेशनल में उसके क्लास में सर्वाधिक अंक थेअमित के साथी छात्र के व्यवहार ने उसे तोड़ दिया था पर आज अमित के कक्षा में इतने अच्छे प्रदर्शन को देखकर उसके टूटे मनोबल सहारा मिला। उसे लगा उसका बेटा इतना कमजोर नहीं है जितना वह सोच रही थीउसे भी मुकाबला करना आता है।

उसकी सफलता पर उत्साहित होकर उसे चूमते हुए उसने हर्ष मिश्रित स्वर में कहा,‘ कीप इट अप बेटा, अपनी इसी स्प्रिट से तुम हर एक को हरा सकते हो।’

‘ आई नेवर डिस्अपाइंट यू माम।’ कहकर उसने पैर छू लिये।

उसने उसे उठाकर गले से लगा लिया। उसका आत्मविश्वास से भरा स्वर सुनकर उसे लगा जैसे वह गहरी खाई में डूबने से बच गई है वरना दूसरे तो दूसरे अपनों ने भी उसे कहीं का नहीं छोड़ा था।

 खुशी तो उसे इस बात की थी कि उसके बाद अमित ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसी का अनुसरण दिव्या ने कियाअमित ने जब कैट की परीक्षा में सर्वाधिक परसाइंटिल प्राप्त किये तो उसकी सफलता से उद्वेलित होकर इंद्र ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए भावनाओं में बह कर कहा था,‘ कामिनी, आज ईश्वर ने मेरे जीवन में रंग ही रंग छितरा दिये हैंप्रकाश फैला दिया हैमैं नहीं जानता कि कितने रंग होते हैं तथा प्रकाश का रंग क्या हैै किन्तु आज लगता है कि तुम्हारे नेत्रों के द्वारा मैंने संसार की प्रत्येक वस्तु को देख लिया हैस्पर्श कर लिया हैमहसूस कर लिया है।’ सुनकर वह निहाल हो गई थी, लगा जैसे उसका जीवन सफल हो गया है।

अमित एमबीए करके अगले हफ्ते ही एक मल्टीनेशनल कंपनी ज्वाइन करने जा रहा हैज्वाइन करने से पहले कुछ दिन वह अपनेे माता-पिता के साथ बिताना चाहता हैदिव्या भी उसके साथ रहने के इरादे से आ रही है।

 दोनों बड़े तो हो गये हैं पर अभी भी बच्चों से कम नहीं हैं। अमित ने फोन पर ही उसने कहा था,‘ ममा, ढेर सारा गाजर का हलुवा बनाकर रखना।’

दिव्या की फरमाइश थी उसके हाथ के बने गुलाब जामुन खाने की   

कालबेल की आवाज ने उसकी विचार तंद्रा को भंग किया दरवाजा खोला तो अमित और दिव्या थे। दोनों ने उसके चरण स्पर्श किये तो उसने उन्हें उठाकर सीने से लगाते हुए कहा,‘ बच्चों तुम्हारी जगह वहाँ नहीं, मेरे दिल में है।अब तुम बड़े हो गये हो, हमारे मित्र बनकर रहो।’

‘ पर ममा, आप बड़ी है, आपके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने का हक तो हमारा है ही या इससे भी आप हमें वंचित करना चाहती हैं।’ अमित ने कहा।

सुनकर वह निहाल हो उठी थीयही संस्कार और विचार तो हमारी संस्कृति की धरोहर हैं। इंसान चाहे कितना ही बड़ा क्यों न बन जाए पर आचार विचारों में परिवर्तन नहीं आना चाहिए, ऐसा उसका मानना था। उसे खुशी थी कि उसके बच्चे उँची उड़ान भरते हुए भी संस्कारों से जुड़े हुए हैं।

‘ ममा, पापा कहाँ है ? वह दिख नहीं रहे हैं।’ दिव्या ने चारों ओर देखते हुए कहा।

‘ वे आते ही होंगे। तुम लोग फ्रेश हो, तब तक मैं खाना लगाती हूँ ।

वह खाना लगा ही रही थी कि इंद्र आ गये। हाथ में कई पैकेट लेकरबच्चों के लिये फल, मिठाई और समौसे लेकर आये थे। बच्चों ने भी उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। खाना खाते हुए बच्चे उससे ज्यादा पापा से ही बातें करते रहे। अमित जहाँ अपने नये जाॅब के बारे में बता रहा था वहीं दिव्या एमबीबीएस के बाद नेत्र विशेषज्ञ बनने की अपनी इच्छा बता रही थी।

‘ अच्छा अब बताओ रात में क्या खाओगे?’ उठने लगे तो उसने बच्चों से पूछा।

‘ ममा, आज रात का खाना हम सब होटल में खायेंगे।’ अमित ने कहा।

‘ ठीक है, तुम लोग चले जाना।’ इंद्र ने उठते हुये कहा।

‘ पापा, आज आपको भी चलना पड़ेगा।’ अमित ने कहा।

‘ पर बेटा, तुम तो जानते ही हो कि बाहर जाना हमने कबका छोड़ दिया है।’

‘ कम ऑन पापा, अब हम बच्चे नहीं हैं जो लोगों के तानों से घबरा जाए या हर्ट होंबस हम इतना जानते हैं कि यू आर अवर लवली फादरवी बोथ आर प्राउड आफ यूआज हम जो कुछ है, आपके कारण ही हैंहमारे लिये यही सच है।’ अमित ने उनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा।

‘ पापा, आज आपकी और ममा की पच्चीसवीं वेडिंग एनीवरसरी हैइसे तो सेलीब्रेट करना ही होगाअतः आज आप हमें मना नहीं कर सकते।’ दिव्या ने उनके गले में हाथ डालते हुए कहा।

‘ जैसी तुम लोगों की इच्छा।’ भरे गले से इंद्र ने कहा था।

कामिनी की आँखें भी छलछला आई थीं। भला प्यार, विश्वास, आदर और समर्पण का इससे अच्छा तोहफा उनके लिये और क्या हो सकता है ? आखिरकार इंद्र को आज स्वीकृति मिल ही गई।


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