सवाल जिसने सोच बदल दी
सवाल जिसने सोच बदल दी
एक बड़े संस्थान में प्रबंधन प्रशिक्षुओं का चयन चल रहा था।
अंतिम चरण था—समूह चर्चा।
विषय रखा गया:
“क्या भारत को एक तानाशाह चाहिए?”
कमरे में हलचल थी। विषय सीधा था, पर हल्का नहीं।
🔹 प्रतिभागी 1
“भारत को एक तानाशाह चाहिए। फैसले तेजी से होंगे, काम रुकेगा नहीं।”
🔹 प्रतिभागी 2
“हाँ, लोकतंत्र में बहुत समय लगता है। एक मजबूत व्यक्ति होगा तो अनुशासन आएगा।”
🔹 प्रतिभागी 3
“विकास के लिए सख्ती जरूरी है। बहुत ज्यादा आज़ादी भी नुकसान करती है।”
बातें तेज़ी से एक ही दिशा में जा रही थीं।
लगभग सभी सहमत दिख रहे थे।
तभी एक आवाज़ आई—शांत, बिना जल्दबाज़ी के।
🔹 प्रबंधन प्रशिक्षु
“अगर वही तानाशाह निरंकुश हो जाए तो?”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
🔹 प्रतिभागी 2
“तो हम उसे हटा देंगे।”
🔹 प्रतिभागी 1
“हाँ, पाँच साल बाद बदल देंगे।”
प्रबंधन प्रशिक्षु ने थोड़ा रुककर कहा—
“तो फिर वह तानाशाह कैसे हुआ?
अगर आप:
उसे चुन सकते हैं,
और बाद में हटा भी सकते हैं,
तो असली ताकत उसके पास नहीं, आपके पास है।”
अब चर्चा की दिशा बदल चुकी थी।
पहले जहाँ लोग समाधान बता रहे थे,
अब वे सोचने लगे थे।
🔹 प्रतिभागी 3
“लेकिन हमें मजबूत नेतृत्व तो चाहिए…”
प्रबंधन प्रशिक्षु ने धीरे से कहा—
“आप असल में चाहते हैं:
फैसले जल्दी हों,
और अगर गलती हो, तो उसे सुधारा भी जा सके।
लेकिन अगर किसी के पास पूरी ताकत होगी,
तो उसे हटाना आसान नहीं होगा।
और अगर उसे हटाना आसान है,
तो उसकी ताकत पूरी नहीं है।”
कमरे में फिर खामोशी थी—
इस बार सोच की खामोशी।
प्रबंधन प्रशिक्षु ने आगे कहा—
“शायद हमें तानाशाह नहीं चाहिए।
हमें ऐसा नेतृत्व चाहिए
जो मजबूत भी हो और जवाबदेह भी।”
बैठक खत्म हुई।
बाहर निकलते हुए एक वरिष्ठ सदस्य ने धीरे से कहा—
“आज चर्चा में किसी ने ज्यादा नहीं बोला,
लेकिन जिसने बोला, उसने दिशा बदल दी।”
