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Anand Mishra

Others

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Anand Mishra

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एक कुर्सी की आत्मकथा

एक कुर्सी की आत्मकथा

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मैं एक साधारण-सी कुर्सी हूँ।

मेरी अपनी आवाज़ नहीं, पर मुझ पर बैठने वालों के शब्दों में मैं बोलती रही हूँ।

मैं स्वयं नहीं चलती, पर लोगों के साथ जगह-जगह जाती रही हूँ।

फिर भी मैंने इस संसार को बहुत करीब से देखा है।

मेरा जन्म एक पेड़ के रूप में हुआ था।

मैं जंगल में खड़ा था—मजबूत, हरा-भरा, और जीवन से पूर्ण।

पक्षी मुझ पर बसेरा करते थे, हवा मेरे पत्तों से खेलती थी।

पर एक दिन मनुष्य आया,

और मुझे काटकर लकड़ी में बदल दिया गया।

कारीगर के हाथों से गुजरते हुए,

मैंने अपना नया रूप पाया—एक कुर्सी का।

मुझे रंगा गया, सजाया गया,

और फिर एक बड़े कमरे में रख दिया गया।

पर मैं वहीं स्थिर नहीं रही—

समय के साथ मैं अलग-अलग स्थानों पर पहुँचती रही,

और हर जगह एक नई कहानी देखती रही।

शुरुआत में मुझे एक साधारण वस्तु समझा गया।

कोई आता, बैठता, और चला जाता।

पर धीरे-धीरे मैंने समझा कि

मैं केवल बैठने का साधन नहीं हूँ—

मैं जिम्मेदारी और पद का प्रतीक हूँ।

कभी मैं एक शिक्षक के नीचे रहा,

जो ज्ञान बाँटते थे।

उनके बैठते ही मैं गर्व से भर उठता था,

क्योंकि उनके शब्द भविष्य गढ़ रहे थे।

फिर एक दिन मुझे एक अधिकारी के कक्ष में रखा गया।

अब लोग मेरे सामने झुकते थे,

मेरे पास आने से पहले अनुमति लेते थे।

मैंने देखा—

मेरे ऊपर बैठते ही इंसान का व्यवहार बदल जाता है।

कुछ समय बाद मैं एक न्यायालय में पहुँची।

एक न्यायाधीश मुझ पर बैठते थे।

उनके निर्णय से किसी को न्याय मिलता,

तो किसी का जीवन बदल जाता।

फिर मैं एक नेता के पास पहुँची।

मेरे सामने भाषण दिए जाते, वादे किए जाते।

भीड़ तालियाँ बजाती, नारे लगाती।

पर मैंने यह भी देखा—

कई बार वादे शब्दों तक ही रह जाते हैं।

और फिर एक दिन मैं एक साधु के आसन के रूप में रखी गई।

वह साधु मुझ पर बैठते थे—

न कोई भय, न कोई अधिकार का प्रदर्शन।

लोग स्वयं झुकते थे,

और वह स्वयं विनम्र रहते थे।

तब मुझे लगा—

सबसे ऊँची कुर्सी वह है,

जहाँ बैठकर भी व्यक्ति झुका रहे।

लेकिन मेरी यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई।

एक दिन मैं एक घर के आँगन में पहुँची।

एक परिवार का मुखिया मुझ पर बैठता था।

वह न कोई अधिकारी था, न नेता, न न्यायाधीश—

पर उसके निर्णय पूरे परिवार को प्रभावित करते थे।

कभी वह प्रेम से सबको जोड़ता,

तो घर में शांति और आनंद रहता।

और कभी उसके कठोर शब्द

घर की दीवारों में सन्नाटा भर देते।

तब मैंने समझा—

सबसे बड़ी जिम्मेदारी वही है,

जहाँ अधिकार कम और अपनापन अधिक होता है।

और फिर…

मैं एक साधारण व्यक्ति के घर पहुँची।

वह न किसी पद पर था,

न किसी को आदेश देता था।

वह बस दिन भर की मेहनत के बाद

मुझ पर बैठकर विश्राम करता था।

न कोई डर, न कोई दिखावा,

न कोई अहंकार।

तब मुझे लगा—

कुर्सी का सबसे सच्चा उपयोग

सत्ता में नहीं, सरलता में है।

कभी-कभी,

कोई हल्के कदमों से आकर मुझ पर चढ़ जाता,

घूमता, खेलता, हँसता,

और बिना किसी संकोच के उतर जाता।

न उसे मेरे महत्व का ज्ञान था,

न किसी पद का अहंकार।

उसकी सहजता ने मुझे यह सिखाया—

जहाँ निष्कपटता होती है,

वहाँ कुर्सी केवल कुर्सी रहती है,

कोई पद नहीं बनती।

कभी मुझ पर एक ईमानदार व्यक्ति बैठा,

जिसने हर निर्णय सत्य और न्याय के आधार पर लिया।

तब मैं हल्की लगती थी—

मानो मेरे ऊपर बैठना भी एक सेवा हो।

और कभी मुझ पर एक भ्रष्ट व्यक्ति बैठा,

जिसके निर्णय स्वार्थ और लालच से भरे थे।

तब मैं भारी हो जाती थी—

मानो मेरे पायों पर अन्याय का बोझ रख दिया गया हो।

और एक दिन…

मुझ पर एक दोगला व्यक्ति बैठा।

सामने वह विनम्रता की बातें करता,

धर्म और ईमानदारी का दिखावा करता,

पर पीछे से वही व्यक्ति छल और स्वार्थ में डूबा था।

उस दिन मैंने सबसे गहरा सत्य देखा—

भ्रष्ट व्यक्ति पहचाना जा सकता है,

पर दोगला व्यक्ति पहचान से बच जाता है।

उसका भार सबसे अधिक था—

क्योंकि वह केवल गलत नहीं था,

वह सच का मुखौटा पहनकर गलत था।

तब मुझे पूर्ण सत्य का एहसास हुआ—

कुर्सी में कोई शक्ति नहीं होती,

शक्ति उस व्यक्ति में होती है जो उस पर बैठता है।

कुर्सी केवल उसके चरित्र को उजागर कर देती है।

समय के साथ मैं पुरानी हो गई।

मेरी चमक फीकी पड़ गई,

मेरे पायों में कमजोरी आ गई।

अब मुझे एक कोने में रख दिया गया है।

अब न कोई झुकता है,

न कोई अनुमति माँगता है।

लेकिन आज भी मैं वही हूँ—

वही कुर्सी, जिसने इंसानों को बदलते देखा है।

मैंने सीखा है:

पद बदलते रहते हैं,

कुर्सियाँ बदलती रहती हैं,

पर मनुष्य का चरित्र ही उसकी असली पहचान होता है।

और अंत में मैं यही कहूँगी—

कुर्सी सम्मान नहीं देती,

सम्मान तो कर्म देते हैं।

कुर्सी पर बैठना आसान है,

पर उसके योग्य बने रहना कठिन है।


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