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Vimla Jain

Tragedy Action Classics

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Vimla Jain

Tragedy Action Classics

सुख का असली अर्थ

सुख का असली अर्थ

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सुख का असली अर्थ
कभी-कभी हम घर की साफ सफाई और जिंदगी के कामों में इतने उलझ जाते हैं कि वह छोटे-छोटे क्षण जो बच्चों और घर वालों के साथ में शांति से बीताने चाहिए वह सब भूल जाते हैं।
और जब बच्चे बड़े हो जाते हैं बाहर चले जाते हैं और हम उसी में उलझ कर रह जाते हैं, तब हमको समझ में आता है कि हमने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा जो है खाली साफ सफाई में और कामों में ही और अनुशासन सीखाने में झगड़ा करने में ही बिता दिया।
बाद में बहुत पछतावा होता है यह कहानी इस बात पर आधारित है । आशा है आपको मेरी कहानी का मर्म पसंद आएगा
कहानी
'दर्शनाबेन, मेरी उम्र भले ही आपके जितनी नहीं है, लेकिन मैं इतना जरूर समझती हूँ कि स्त्री स्वयं एक शक्ति है। वह चाहे तो सृजन भी कर सकती है और विसर्जन भी।'

मणिनगर की गलियों में सुबह का सूरज हमेशा एक नई ताजगी लेकर उगता था। कांकरिया झील की ओर से आने वाली ठंडी हवा सोसायटी के पेड़ों के साथ अठखेलियाँ करती थी।

सुबह के नौ बजे थे। 'राधे रेसिडेंसी' की दूसरी मंजिल पर रहने वाली नेहा गीले कपड़ों से भरा टब उठाकर अपनी बालकनी में आई।

साधारण-सा कुर्ता, बेमेल सलवार, बालों का अस्त-व्यस्त जूड़ा और माथे पर पसीना व चिंता की लकीरें—यही नेहा का रोज का रूप था।

एक-एक करके कपड़े झटककर तार पर सुखाते समय अचानक उसकी नजर सामने बने 'आतिथ्य' नाम के टेनामेंट पर पड़ी।

वहाँ का नजारा हमेशा की तरह सुंदर था। हरे-भरे मनीप्लांट, बोगनवेलिया, सदाबहार, बड़े-बड़े गुड़हल के पौधे और रंग-बिरंगे गमलों से सजा छोटा-सा बगीचा। उसमें लकड़ी की झूलती कुर्सी पर दर्शनाबेन बैठी थीं।

इस्त्री किया हुआ सुंदर सूती कुर्ता, करीने से संवारे हुए बाल, होंठों पर हल्की लिपस्टिक और चेहरे पर एक अलग ही चमक। पास रखी छोटी मेज पर गर्म चाय का कप और एक पुस्तक थी। दर्शनाबेन आराम से चाय की चुस्की लेते हुए पुस्तक के पन्ने पलट रही थीं।

उन्हें देखकर नेहा ने फिर एक लंबी साँस ली।

उसने अपने तुलसी के पौधे की ओर देखा। पिछले तीन दिनों से उसे ठीक से पानी भी नहीं मिला था। पास के दो गमलों में लगे पौधे तो पूरी तरह सूख चुके थे।

नेहा को बागवानी का बहुत शौक था, लेकिन उसके पास समय कहाँ था? उसे तो अपना ध्यान रखने की भी फुर्सत नहीं मिलती थी।

शादी के बारह साल और दो बच्चों के बाद उसकी पूरी जिंदगी घड़ी की सुइयों के साथ दौड़ने वाली मशीन बनकर रह गई थी।

वह मन ही मन बुदबुदाई, 'कितनी अच्छी जिंदगी है! काश, मैं भी कभी आराम से बैठकर गर्म चाय पी पाती और कोई पुस्तक पढ़ पाती।'

कपड़े सुखाकर वह वापस घर के कामों में लग गई।

घर की सफाई और खाना बनाते-बनाते दोपहर के बारह बज गए। वह सब कुछ छोड़कर स्कूटी की चाबी उठाकर बाहर निकल गई।

बारह बजकर दस मिनट पर स्कूल बस उसके बेटे आयुष को छोड़ती थी। आयुष को लेकर घर पहुँचते ही उसकी शरारतें शुरू हो गईं। कभी बस्ता सोफे पर फेंकना, कभी जूते-मोजे इधर-उधर उछालना और कभी स्कूल की ढेर सारी बातें सुनाना।

नेहा उसके हाथ-मुँह धुलवाती जाती और उसकी बातें भी सुनती जाती।

अभी आयुष शांत हुआ ही था कि एक बजे बेटी दिया की बस आने का समय हो गया। नेहा फिर दौड़ी और उसे लेकर घर आई।

दोनों बच्चों को खाना खिलाया, उनका होमवर्क करवाया और देखते-देखते शाम के पाँच बज गए।

दोनों बच्चे नीचे सोसायटी के बगीचे में खेलने चले गए।

थकी हुई नेहा बालकनी में सूख चुके कपड़े उतारने पहुँची। उसने देखा कि दर्शनाबेन फिर चाय, नाश्ता और एक पत्रिका लेकर अपने छोटे-से बगीचे में आराम से बैठी थीं।

नेहा को उनसे बहुत ईर्ष्या होती थी। वह सोचती, 'ईश्वर ने सारा सुख इन्हीं के भाग्य में लिखा है। मेरी ओर तो कभी देखा ही नहीं!'

शाम के साढ़े छह बजे नेहा बच्चों को लेने नीचे उतरी। उसने देखा कि दर्शनाबेन अपने ही अपार्टमेंट के बगीचे में सुरेखाबेन के साथ टहल रही थीं।

दोनों उसके पास से गुजरीं। दर्शनाबेन ने नेहा की ओर देखकर औपचारिक-सी मुस्कान दी। नेहा ने भी किसी तरह मुस्करा दिया, लेकिन उसके मन में ईर्ष्या की आग अब भी जल रही थी।

वह फिर सोचने लगी, 'कितना सुखी जीवन है इस स्त्री का!'

दिन बीतते गए। धीरे-धीरे त्योहार आने लगे, लेकिन नेहा और दर्शनाबेन की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया।

रविवार की सुबह नवरात्रि का पहला दिन था। मौसम कुछ अलग था। बारिश का मौसम विदा होने वाला था, फिर भी आसमान में बादल छाए हुए थे।

नेहा के घर में खुशी का माहौल था। समीर भी घर पर था और दोनों बच्चे अपने पापा के साथ खूब मस्ती कर रहे थे।

समीरे रसोई में आकर नेहा को पीछे से पकड़ लिया और हँसते हुए बोला, 'आज गरमागरम दालवड़े बनाओ न, नेहा! बाहर कितना अच्छा मौसम है!'

नेहा ने बनावटी नाराजगी दिखाते हुए उसे रसोई से बाहर निकाल दिया, लेकिन उसका मन अंदर से संतोष और खुशी से भर गया।

दोपहर में सबने खाना खाया और फिर टीवी के सामने बैठ गए। शाम को सबको चाय-पानी और नाश्ता देने के बाद नेहा कचरे की थैली लेकर नीचे रखने जा रही थी।

तभी उसने देखा कि उसकी बिल्डिंग के गेट के पास दर्शनाबेन खड़ी थीं। उनके हाथ में एक सूटकेस था। उनकी आँखें सूजी हुई थीं, मानो वे पूरी रात रोती रही हों।

नेहा से रहा नहीं गया। परिचय भले ही बहुत गहरा नहीं था, लेकिन एक स्त्री के प्रति दूसरी स्त्री की सहज संवेदना उसे दर्शनाबेन के पास ले गई।

उसने धीरे से पूछा, 'कैसी हैं, दर्शनाबेन? कहीं बाहर जा रही हैं क्या?'

दर्शनाबेन ने चौंककर उसकी ओर देखा। उनके चेहरे पर रोज वाली बनावटी मुस्कान नहीं थी। आँखों में खालीपन और अकेलापन साफ दिखाई दे रहा था।

उन्होंने कहा, 'हाँ, नेहाबेन। कुछ दिनों के लिए नासिक जा रही हूँ, अपने आश्रम में। मेरी बहन अब इस दुनिया में नहीं रही।'

उनकी आवाज काँप रही थी।

नेहा ने सहजता से पूछ लिया, 'आप अकेली जा रही हैं? आपके पति और बच्चे...?'

यह पूछते ही उसे लगा कि शायद उसने उनकी निजी जिंदगी के बारे में पूछकर सीमा पार कर दी है।

दर्शनाबेन ने गहरी साँस ली। उनकी पलकों से एक आँसू निकलकर गाल पर बह गया।

वे भारी आवाज में बोलीं, 'मेरे पति को गुजरे पाँच साल हो गए। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। मेरा इकलौता बेटा कनाडा में बस गया है। पिता के अंतिम संस्कार के लिए आखिरी बार भारत आया था। उसके बाद उसने न तो भारत की ओर देखा और न मेरी ओर। उसके पास मुझसे फोन पर पाँच मिनट बात करने का भी समय नहीं है।'

कुछ पल रुककर वे फिर बोलीं,

'मैं हर सुबह खुद को अच्छी तरह तैयार करती हूँ, क्योंकि अगर ऐसा न करूँ तो मुझे लगता है कि जैसे मैं जीते-जी मर गई हूँ।

मैं अपने बगीचे में घंटों पुस्तक लेकर बैठी रहती हूँ, लेकिन मेरा ध्यान पुस्तक में नहीं होता। मैं तो सामने तुम्हारी बालकनी की ओर देखती रहती हूँ।'

'मेरी बालकनी की ओर?' नेहा आश्चर्य से बोली।

'हाँ, नेहाबेन! मैं तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को देखती रहती हूँ। तुम्हारे बाल बिखरे होते हैं, हाथों में कपड़े होते हैं, लेकिन तुम्हारे घर से बच्चों की खिलखिलाहट सुनाई देती है।

मैं देखती हूँ कि तुम्हारा बेटा स्कूल से आकर तुमसे लिपट जाता है। शाम को तुम्हारे पति घर आते हैं तो तुम दोनों साथ हँसते-बोलते हो।

मैं रोज ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि वह तुम्हारे जीवन की इस भागदौड़ और व्यस्तता का थोड़ा-सा हिस्सा मुझे भी दे दे।

मैं भी चाहती हूँ कि कोई मेरा नाम लेकर मुझे आवाज दे। कोई मुझसे खाना माँगे। कोई मेरे आँचल में अपना चेहरा छिपाकर रोए।

यह अकेलापन और सुख का दिखावा मुझे अंदर से खोखला कर रहा है। ये पुस्तकें, ये गमले, यह सजावट—सब मेरे खालीपन को छिपाने के व्यर्थ प्रयास हैं।'

नेहा कुछ कहने ही वाली थी कि तभी एक टैक्सी आकर रुकी।

दर्शनाबेन ने अपना सामान टैक्सी में रखा। जाते समय उन्होंने नेहा का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा,

'तुम बहुत भाग्यशाली हो, नेहाबेन! जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है लोगों का प्यार और उनके बीच व्यस्त रहना।

जिसे समय नहीं मिलता, वह दुखी होता है; लेकिन जिसका पूरा दिन किसी के इंतजार में बीत जाता है, उसका दुख ईश्वर किसी को न दे।'

नेहा की आँखें भर आईं। उसने टैक्सी में बैठी दर्शनाबेन का हाथ पकड़कर कहा,

'दर्शनाबेन, मेरी उम्र भले ही आपके जितनी नहीं है, लेकिन मैं इतना समझती हूँ कि स्त्री स्वयं एक शक्ति है। वह चाहे तो सृजन भी कर सकती है और विसर्जन भी।

आप आश्रम से लौटकर आइएगा। अगर आप मेरी इस अस्त-व्यस्त जिंदगी में शामिल होंगी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। और मैं भी कभी आपकी अकेलेपन की झूला-कुर्सी पर आपके साथ झूलने आऊँगी।'

दोनों की आँखों में आँसू आ गए।

दर्शनाबेन टैक्सी में बैठकर चली गईं और नेहा अपने फ्लैट की ओर चल पड़ी।

जिस जिंदगी को वह बोझ समझती थी, जिस भागदौड़ से वह परेशान हो चुकी थी, वही किसी दूसरे के लिए एक सपना थी।

सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

घर का दरवाजा खोलते ही उसने देखा कि समीर और बच्चे शरारतों में लगे हुए थे। खिलौने इधर-उधर बिखरे थे, मेज पर बस्ता पड़ा था, समीर हँस रहा था और बच्चे शोर मचा रहे थे।

लेकिन आज पहली बार नेहा को इस अस्त-व्यस्तता में एक अद्भुत संगीत सुनाई दिया।

आज उसे यह सब बोझ नहीं लगा। उसे महसूस हुआ कि यह तो उसके जीवित होने का प्रमाण है। यह प्रेम से भरा एक सच्चा संसार है।

घर के ड्राइंग रूम में रखी आदिशक्ति माँ भगवती की तस्वीर की ओर देखकर उसने मन ही मन प्रार्थना की,

'हे माँ भगवती! मुझे शक्ति और भक्ति से भरपूर रखना।'
हिंदी स्वरचित
विमला जैन



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